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पाक इसलाम की रक्षा में शहीद हुए इमाम हुसैन

हारत इमाम हुसैन की शहादत के चालीसवें दिन को चेहल्लुम मनाया जाता है। शहादत के चालीसवें दिन की तारीख को सबसे बड़े दिन के रूप में मनाते हैं। इमाम हुसैन ने अन्याय के खिलाफ जंग करते हुए अपना सब सुछ लुटा दिया। यजीद इतना क्रूर शासक था कि उसके डर से लोगों ने उन शहीदों की लाशों को रेगिस्तान में यूं ही छोड़ दिया और उनकी अंत्येष्टि तक नहीं की। अब जरा उन घटनाओं पर गौर करं जिसके चलते हारत इमाम हुसैन, पैगंबर हारत मोहम्मद (स) के नाती और हारत अली के पुत्र को मदीना छोड़ कर अपने सगे-संबंधियों, औरतों और बच्चों को कर्बला जाना पड़ा।ड्ढr जब इनका काफिला उर्दू माह की मुहर्रम की दूसरी तिथि को कर्बला नामक स्थान पर पहुंचा, तो वहां यजीद के सिपाहियों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। उन्हें इसी स्थान पर रुकना पड़ा। सातवीं मुहर्रम से पानी बंद कर दिया गया और दसवीं मुहर्रम को संसार की सबसे बड़ी जंग छिड़ गयी। एक तरफ तीन दिन के भूखे-प्यासे 72 लोग थे, तो दूसरी ओर लाखों सिपाही थे। यजीद निरंकुश शासक था और उसे किसी की टोकाटोकी पसंद नहीं थी। वह इस्लामी कानून को अपने हिसाब से तोड़ना-मरोड़ना चाहता था। परंतु हजरत इमाम हुसैन जानते थे कि ऐसा करने से उनके नाना पैगंबर हारत मोहम्मद (स) के इस्लाम में परिवर्तन हो जायेगा, जिसको उन्होंने इतनी मेहनत से खड़ा किया है। यजीद की स्वच्छंदता में हुसैन सबसे बड़ा रोड़ा थे। इस जंग में इमाम हुसैन शहीद हो गये। शहादत के बाद कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि नैतिकता समाप्त हो गयी है, लेकिन कुछ ही समय बाद यजीद की गद्दी जाती रही। इस्लाम के मूल्यों और आदर्शो को बचाये रखने में इमाम हुसैन की शहादत को आज तक याद किया जाता है। हारत इमाम हुसैन को हिन्दुस्तान से काफी लगाव था। उनकी अंतिम इच्छा हिंद आाने की थी। वे हिन्दुस्तान तो नहीं आ सके, पर उनकी शहादत को यहां के लोग भी अपने तरीके से मनाते हैं। वह स्थान जहां पर रहब की सेना रुकी थी, आज भी इराक में मौजूद है, जिसे दयार-ए-हिन्दिया यानी हिन्दुस्तानी सैनिकों की छावनी के नाम से जाना जाता है। आज हिन्दुस्तान के हर शहर, हर गांव में बड़ी ही अकीदत और सम्मान के साथ ताजिया निकाला जाता है, जिसमें हाय हुसैन, हाय हुसैन करते हुए लोग कर्बला जाते हैं और उनके पवित्र शवों के प्रतिबिंब को श्रद्धा के साथ यह सोच कर दफनाते हैं कि या इमाम, हम अगर कर्बला के मैदान में होते तो तुम्हारा पवित्र शव तपती रत पर यूं न पड़ा होता। इस प्रकार लोग अपनी नम आंखों से इमाम हुसैन (अ) को श्रद्धांजलि देते हैं।ड्ढr (लेखक रांची विवि के मानव विज्ञान विभाग में व्याख्याता हैं।)ड्ढr ं

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  • Web Title: पाक इसलाम की रक्षा में शहीद हुए इमाम हुसैन