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चार दशक में 15 लाख लोग छोड़ गये झारखंड

वतंत्रता के तत्काल बाद विकास की नयी अवधारणा के तहत आधारभूत संरचना और औद्योगिक परियोजनाओं के विस्तार के क्रम में विगत 45 वर्षो में अकेले झारखंड से 15 लाख से अधिक लोग विस्थापित होकर चले गये। जो थोड़े बहुत मोहवश रह गये, वे अब भी अतिक्रमणकारी बने हुए हैं। विस्थापन के इस अभिशाप से आदिवासी ही नहीं, अनुसूचित जातियों के साथ अन्य भी ग्रस्त हुए हैं।इतनी बड़ी आबादी के पलायन से झारखंड की सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना भी छिन्न-भिन्न हुई है। भूमि अधिग्रहण का विरोध करने पर लोगों को हिंसा का शिकार भी होना पड़ा। झारखंड में कई जानें गयी हैं। यह सिलसिला जारी है।विस्थापन के विरुद्ध सक्रिय जन संगठन क्रज जनमुक्ित आंदोलन ने भारतीय सामाजिक संस्थान दिल्ली के स्रेत से इस संदर्भ में आंकड़ा प्रस्तुत किया है। इसके अनुसार वर्ष 1से े बीच छोटे-बड़े जलाशयों, निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों, कोयला एवं अन्य खनिजों के उत्खनन, राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी परियोजनाओं सहित सेंचुरी एवं राष्ट्रीय पार्को तथा आधारभूत संरचना के विकास की परियोजनाओं से भारी विस्थापन हुआ है। अकेले छह लाख से अधिक (620372) आदिवासी उजड़े हैं, तो इतने ही (676575) अन्य जातियों के लोग भी। यही नहीं अनुसूचित जाति के भी दो लाख से अधिक (2128लोग विस्थापन से प्रभावित हुए हैं। झारखंड में कोई भी वर्ग विस्थापन से अछूता नहीं है। लेकिन जल, जंगल और जमीन पर निर्भर होने के कारण आदिवासियों को ज्यादा कष्ट झेलना पड़ा है। इसी कारण विकास के नाम पर भूमि अधिग्रहण से चिढ़ रहा यह समाज विद्रोही हो गया है। सरकार की औद्योगिक और पुनर्वास नीतियां भी कारगर नहीं हैं। केवल मुआवजे से पीड़ितों का जीवन संवर नहीं रहा है। वहीं, बाहर चले गये लाखों लोग वहां भी नागरिक अधिकारों से वंचित हैं और किसी तरह जीवन यापन कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल, असम, पंजाब, दिल्ली आदि में पलायित लोगों की दुर्दशा की कहानियां किसी से छिपी नहीं हैं। आज भी यह क्रम जारी है।ं

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