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घात-प्रतिघात की नेपाली बिसात

‘कुर्सी खतरे में है तो प्रजातंत्र खतरे में है। कुर्सी खतरे में है तो देश खतरे में है। कुर्सी खतरे में है तो दुनिया खतरे में है। कुर्सी न बचे तो भाड़ में जाए प्रजातंत्र-देश और दुनिया!’ जनवादी कवि गोरख पांडे का ‘कुर्सीनामा’ भले ही भारत में विस्मृत कर दिया गया हो, लेकिन नेपाल के राजनीतिक विश्लेषक वहां के हालात के संदर्भ में इसे ताजा किए जा रहे हैं। वजह न सिर्फ गिरिाा प्रसाद कोइराला हैं, बल्कि सरकार में सहयोगी दूसरे नेता भी हैं, जो गाहे-बगाहे समर्थन वापसी का खम ठोक रहे हैं। काठमांडो के बालुआशर स्थित प्रधानमंत्री निवास छोड़ने के बाद गिरिाा बाबू को सबसे ज्यादा प्रजातंत्र की चिंता सता रही है। वे विराटनगर से बालुआशर, बयानों के मिसाइल दनादन दाग रहे हैं। गिरिाा बाबू की पहली मिसाइल है- संसद सत्र तुरंत बुलाओ। दूसरी मिसाइल है- प्रचंड नेपाली सेना या जनमुक्ित सेना में से किसी एक को चुने। और तीसरी मिसाइल है- अब प्रधानमंत्री प्रचंड का विकल्प खोजना होगा। तो क्या लालकृष्ण आडवाणी होंगे नेपाल के प्रधानमंत्री? संभव है पढ़ने-सुनने वालों को यह प्रश्न पटरी से उतरा हुआ लगे, पर जिस तरह से नेपाली अखबारों के नेट संस्करणों पर ‘आडवाणी फॉर पी. एम.’ नमूदार हो रहे हैं, देर-सबेर यह सवाल सर्वव्यापी होगा ही। मधेसी जनाधिकार फोरम मधेस के अध्यक्ष भाग्यनाथ प्रसाद गुप्ता पूछते हैं- ‘भाजपा नेता आडवाणी जी का नेपाल में क्या काम है? क्या भाजपा नेपाल के प्रतिक्रियावादियों को एक और अवसर दे रही है कि वे भारतीय विस्तारवाद के खिलाफ डंडा भांजें?’ पशुपतिनाथ मंदिर विवाद में प्रचंड के दो कदम पीछे कर लेने से जो लोग हिंदूवादियों के खिलाफ गुस्से में हैं, हो सकता है इंटरनेट पर आडवाणी का यह अक्स उनके लिए हथियार बन जाए। अमेरिकी सहायक विदेशमंत्री रिचर्ड बाउचर से कामरड प्रचंड ने अप्रैल में संविधान तैयार कर लेने की ‘डेड लाइन’ तय कर दी है, उसे लेकर तराई इस समय सबसे अधिक संवेदनशील है। तराई में हर दस कोस पर एक नई पार्टी है। ऐसे में ‘एक मधेस-एक प्रदेश’ का सपना तो पूरा होने से रहा। तराई में सशस्त्र समूह जयकृष्ण गोइत, ज्वाला सिंह और प्रह्लादगिरी ‘पवन’ के बीच समझौते पर प्रेक्षकों का दावा है कि सशस्त्र समूह के लोग 24 घंटे भी साथ नहीं चल सकते। नेपाली कांग्रेस की केन्द्रीय समिति के एक सदस्य हैं गोविंदराज जोशी। हिमाल खबर पत्रिका के ताजा अंक में उन्होंने लिखा कि पूर देश में छह अलग-अलग प्रदेश बनना चाहिए ताकि संघीय शासन प्रणाली सुचारु रूप से चले। यों तो नेपाली कांग्रेस के भीष्म पितामह गिरिाा प्रसाद कोइराला की राजनीतिक भूमि तराई रही है, पर उन्होंने कभी ‘एक मधेस-एक प्रदेश’ की पैरोकारी नहीं की। बुटवल में 17 से 22 फरवरी के राष्ट्रीय महाधिवेशन में एमाले के अध्यक्ष झलनाथ खनाल बनते हैं, या माधव नेपाल, यह बहस का विषय है। यहां भी भौगोलिक आधार पर केन्द्रीय समिति में माधव नेपाल का पलड़ा भारी दिखता है। मतलब, नेपाल की राजनीति को वहां का जातीय भूगोल तय करता है। पर दिलचस्प यह है कि एमाले हो या माओवादी, सबकी मंजिल एक है कि ‘एक मधेस-एक प्रदेश’ किसी भी हालत में नहीं बनना चाहिए। ऐसे में मधेसी जनाधिकार फोरम के नेता उपेन्द्र यादव सरकार को समर्थन जारी रखेंगे, यह भी मिलियन डॉलर वाला सवाल है। नेपाल को संघीय शासन में ले जाने और मधेस को क्षेत्रीय स्वायत्तता प्रदान करने का सपना कुलानन्द झा, बलदेवदास यादव, रामजनम तिवारी जसे नेताओं ने भी देखा था। नेपाल सद्भावना पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष गजेन्द्र नारायण सिंह भी पूर्वी पहाड़, पूर्वी तराई, पश्चिमी पहाड़, पश्चिमी तराई और काठमांडो उपत्यका जसे पांच प्रांतों और उसके भीतर विराट, विदेह, सिमरौन, अवध और थरुहट जसे पांच उपप्रदेश के पक्ष में थे। कायदे से प्रचंड सरकार को संघीय स्वरूप के सवाल पर जनमत संग्रह करा लेना चाहिए। लेकिन पता नहीं कामरडों को किस बात का डर है। मधेसी एकता का उबाल देखते ही माओवादियों को यह कहने में जरा भी मुरव्वत नहीं होती कि यह ‘महल’ के इशार पर हो रहा है या फिर बाहरी ताकतें ऐसा करा रही हैं। बाहरी ताकत से उनका मुराद भारत से होता है। अब कोई प्रधानमंत्री प्रचंड से पूछे कि किस बिना पर ज्ञानेन्द्र अब भी नागाजरुन महल में रह रहे हैं। उनकी मां और मुमा बड़ा महारानी अब भी नारायण हिट्टी राजदरबार के एक हिस्से में हैं। क्या नेपाल की जनता ऐसा चाहती है? प्रचंड से कोई यह नहीं पूछता कि राजा के दरबार में रहे नौकशाह आपके यहां क्या कर रहे हैं? देश की जनता को पता ही नहीं चला कि शाही वक्त को सलाम करनेवाले शक्ित के पुजारी कब माओवादियों के सलाहकार हो गए। रमेशनाथ पांडे की कभी राजदरबार में तूती बोलती थी। वे अब प्रधानमंत्री दाहाल के अघोषित परराष्ट्र सलाहकार हैं। हीरा बहादुर थापा प्रधानमंत्री के घोषित परराष्ट्र सलाहकार हैं। उनकी रिश्तेदारी माओवादी नेता दीनानाथ शर्मा से है। शाही शासन में मुख्य सचिव लोकमान सिंह कार्की प्रधानमंत्री के अघोषित प्रशासनिक सलाहकार हैं। राजा काल के रक्षा सचिव विष्णुदत्त उप्रेती प्रचंड के घोषित रक्षा सलाहकार हैं। पूर्व रानी ऐश्वर्य के अंगरक्षक अशोक श्रेष्ठ, ज्ञानेन्द्र के जवाईं राज बहादुर सिंह के व्यावसायिक साझेदार अजय सुमार्गी की प्रधानमंत्री के पुत्र प्रकाश दाहाल से गहरी छन रही है। एक और पूर्व राजावादी सूर्यबहादुर सेन, पूर्व आईाीपी मोतीलाल बोहोरा, पूर्व डीआईाी श्री पुरुष ढकाल, गोपालमान श्रेष्ठ जसे प्रशासकों के अलावा कोई 300 पूर्व पंच और राजावादी हैं, जिन्होंने अपनी बन्दगी बदल ली है। प्रशासन का महत्वपूर्ण महकमा अब फिर इनके हाथों में है। नेपाल में राजा नहीं है, पर राजा का पुराना तंत्र कितना ताकतवर है, इसके उदाहरण हैं प्रधान सेनापति रुक्मांगद कटवाल। उनके आगे चुनी हुई सरकार के प्रतिरक्षा मंत्री रामबहादुर थापा असहाय हैं। कटवाल ने रक्षा मंत्रालय के आदेशों को बेमतलब बना दिया है। अपनी मर्जी से 2304 सिपाहियों और 245 दूसर कर्मियों की भर्ती कर ली। जसे राजाकाल में प्रधानमंत्री या रक्षामंत्री सेनापति को हटा नहीं सकते थे, आज भी वहां यही हालत है। जन सेना के नेपाली सेना में समायोजन की राह में कटवाल को सबसे बड़ा कांटा माना जा रहा है। प्रचंड ने एक विशेष समिति के जरिए यह टास्क अपने हाथों में ले ली है। एक देश में दो सेना का सिद्धांत, क्या दो नाव पर सवारी जसा नहीं लगता? लेखक ईयू-एशिया न्यूज के नई दिल्ली स्थित संपादक हैं।

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