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नई सरकार के सामने होगा चुनौतियों का पहाड़

आगे आने वाली सरकार खुद यूपीए हो या फिर कोई और, लेकिन उसके लिए आर्थिक समस्यों का ऊंचा पहाड़ सामने है। इसकी वजह वैश्विक वित्तीय संकट है या फिर कुछ और, आगामी जून माह में केंद्रीय सत्ता पर आने वाली सरकार के माथे पर भारी वित्तीय चुनौतियां होना तय है। विभिन्न वजहों से इसकी जमीन अभी से तैयार हो गई है। खुद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को इस बात का पूरा अहसास है। लेकिन उन्होंने इस बात को आर्थिक तर्को के कसौटी पर कसते हुये कहा है कि वित्तीय संकट के दौर में ऐसा होना स्वाभाविक ही है। खुद मुखर्जी के मुताबिक चालू वित्त वर्ष आर्थिक संकटों से ग्रस्त रहा है जिसका प्रभाव चौतरफा पड़ा है लेकिन विश्व अर्थव्यवस्था के भावी अनुमानों पर नजर डालें तो आगामी वित्त वर्ष और भी कठिन परिस्थितियों से भरा होगा। लिहाजा, ऐसी असमान्य परिस्थितियों में राजकोषीय घाटे में बढ़ोत्तरी अवश्यंभावी ही है। सरकार ने इस अंतरिम बजट में चालू वित्त वर्ष के लिए निर्धारित राजकोषीय घाटे के सकल घरलू उत्पाद (ाीडीपी) के 2.5 फीसदी से बढ़ाकर 6 फीसदी पर कर दिया है। इसकी वजह मंदी के चलते राजस्व संग्रह में कमी, उर्वरक, पेट्रो उत्पाद और खाद्य सब्सिडी में बेहिसाब बढ़ोत्तरी और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कई बार घोषित किये गये प्रोत्साहन पैकेा हैं। वहीं दूसरी ओर आने वाले वित्त वर्ष के दौरान आर्थिक संकट का संकेत इस बात से मिलता है कि सरकार ने इस बजट में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी के 5.5 फीसदी पर निर्धारित कर दिया है। मतलब यह हुआ कि आगामी वित्त वर्ष के दौरान भी कम से कम दूसरी अथवा तीसरी तिमाही तक अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में रहेगी, परिणाम स्वरूप राजस्व संग्रह दबाव में होगा। दूसरी ओर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार को विभिन्न योजनाओं में सरकारी खर्च बढ़ाना ही है जो इसी बजट से साफ है। सरकार ने आगामी वित्त वर्ष के लिए सकल बजटीय सहायता में 17.16 फीसदी की बढ़ोत्तरी करते हुये 2,8514रोड़ रुपये कर दिया है।ं

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