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पहाड़ों में अश्वगंधा यानी जाड़ा ‘मंदा’

आयुव्रेद में अश्वगंधा को बेशक एक स्वास्थ्यवर्धक बूटी के रूप में पहचाना जाता हो, पर यही अश्वगंधा इन दिनों पहाड़ों के बिगड़ते मौसम की भी गवाही दे रही है। जी.बी. पंत इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट की हिमाचल इकाई के इंचार्ज साइंटिस्ट एस. एस. सामंत ने जब कुल्लू घाटी में अश्वगंधा की झाड़िया देखीं तो उन्हें हैरत हुई। अश्वगंधा गरम मैदानी इलाकों में पाया जाता है और अभी तक ठंडे पर्वतीय इलाकों में यह नहीं उग पाता था लेकिन इसका कुल्लू घाटी तक पंहुच जाना यह बताता है कि अब वहां के मौसम में इतनी गर्मी आ गई है कि अश्वगंधा जसी प्रजातियां अच्छी तरह पनप सकें। सामंत बताते हैं कि अश्वगंधा का कुल्लू घाटी तक पहुंच जाना ग्लोबल वार्मिंग का अकेला लक्षण नहीं है। स्नो लाइन, जहां तापमान शून्य डिग्री सेल्शियस से नीचे रहता है, लगातार ऊपर खिसकती जा रही है। सामंत के मुताबिक, अभी तक हम जब पहाड़ों पर जाते थे तो 3300 से 3600 मीटर की ऊंचाई के बाद हमें पेड़ नहीं दिखाई देते थे। यह ट्री लाइन भी तेजी से खिसकती हुई चार हाार मीटर की ऊंचाई तक पंहुच गई है। यही वजह है कि रोहतांग के बिलकुल पास मढ़ी जसी जगह पर सेब के बागान की संभावना बढ़ गई है। कुछ समय पहले तक मढ़ी ट्री लाइन से काफी ऊपर था और रोहतांग दर्र में भी तकरीबन साल भर बर्फ रहती थी लेकिन अब छह महीने वहां धूल उड़ने की नौबत होती है। सामंत मानते हैं कि पेड़ों का बड़े पैमाने पर कटान, पहाड़ों पर बड़ी परियोजनाओं का लगना और लगातार बढ़ते पर्यटन वगैरह के लिए मोटर गाड़ियों की अधिक आवाजाही इत्यादि स्थितियां इस बदलाव का कारण हैं। औषधि गुण होने की वजह से अश्वगंधा में व्यवसायिक संभावनाएं काफी अच्छी हैं। इसीलिए सामंत किसानों को इसकी खेती की सलाह भी दे रहे हैं। उनका कहना है कि पर्यावरण में हो रहे बदलाव को आजीविका के साधनों से जोड़ना होगा। खासकर ऐसे इलाके, जहां के किसान वातावरण के बदलाव की वजह से परंपरागत फसल नहीं ले पा रहे हैं, वहां वैकल्पिक साधन तलाशने होंगे। यशवंत सिंह परमार कृषि व वानिकी विश्वविद्यालय के डा. शक्ित भारद्वाज भी इस वैकल्पिक राह के लिए रंगीन कैप्सिकम से लेकर कारनेशन के फूलों इत्यादि पर शोध कर रहे हैं।

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  • Web Title: पहाड़ों में अश्वगंधा यानी जाड़ा ‘मंदा’