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सीट बंटवारे का मसला: जदयू और भाजपा में जोर आजमाइश

लोकसभा चुनाव की दस्तक के बाद बिहार का राजनीतिक तापमान परवान पर है। एनडीए ने यूपीए को टक्कर देने का एलान तो कर दिया है, लेकिन पहले उसे अपने अंदर ही काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। एनडीए के दोनों घटक जदयू और भाजपा के बीच सीटों के बंटवार को लेकर जोर आजमाइश शुरू हो गई है। अंतिम निर्णय लिये जाने के पहले ही जदयू ने यह कहकर कि उसका आधार बढ़ा है उसे अधिक सीट देने के बार में भाजपा को सोचना चाहिए, दबाव बनाना शुरू कर दिया है।ड्ढr ड्ढr दोनों दलों के बीच दो दौर की वार्ता हो चुकी है और उसमें प्रारंभिक स्तर की ही बात हो पाई है। सीट बंटवार को लेकर अबतक कोई पहल नहीं हो पाई है जबकि दोनों दलों के प्रदेश के बड़े नेता इसमें शामिल हो चुके हैं। इससे यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि सीट बंटवार पर भाजपा आलाकमान के साथ-साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही अंतिम मुहर लगाएंगे। उधर दोनों दलों के थिंक टैंक अपने-अपने हिसाब से सीटों पर जोड़-तोड़ शुरू कर दिया है। जीत के लिए रणनीति बनाने से लेकर विरोधी को पराजित करने की रणनीति भी बन रही है। गत लोकसभा चुनाव में जदयू ने 24 और भाजपा ने 16 सीटों पर जोर आजमाइश की थी। वह 24:16 की जगह नए सिर से सीटों के निर्धारण के पक्ष में है। हालांकि भाजपा एक कदम भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। अलबत्ता मुजफ्फरपुर सीट पर भी उसकी नजर है, जिसे उसने जार्ज के लिए छोड़ा था। जदयू इस लोकसभा चुनाव में नए सिर से समीकरण बैठाना चाहती है और भाजपा से सीट टू सीट डिस्कस करना चाहती है। पार्टी का मानना है सीटों की जगह जीत को अहम मानकर विमर्श होना चाहिए।ड्ढr ड्ढr जदयू चाहता है कि वह भाजपा को उसकी कमजोर सीटों की जानकारी दे और भाजपा ऐसी ही जानकारी उसे दे और बताए कि इन जगहों पर उनकी जीत मुश्किल है। ऐसे में जीत सुनिश्चित करने के लिए उन सीटों की अदला-बदली की जाए। जदयू का मानना है कि अगर भाजपा उन्हीं 16 सीटों पर लड़ना चाहेगी तो उसी के लिए परशानी है। इनमें से पांच सीटें ऐसी हैं जिनपर भाजपा की जीत थोड़ी मुश्किल है जबकि जदयू उन सीटों को आसानी से निकाल सकता है। खासकर किशनगंज, भागलपुर, मोतिहारी, छपरा और नवादा को वह भाजपा की कमजोर कड़ी मान रहा है।ड्ढr ड्ढr ऐसे में चुनाव लड़ने के पूर्व ही एनडीए पांच सीट हार चुका होगा और उसे पहले से ही मात्र 35 सीटों पर लड़ाई लड़नी होगी। जदयू का मानना है कि अगर एनडीए को ‘दिल्ली’ पर कब्जा करना है और लालकृष्ण आडवाणी को पीएम की कुर्सी पर बैठानी है तो उन सीटों पर भाजपा को दावा छोड़ देना चाहिए। इसके बदले वह दूसरी सीट ले सकती है, जहां उसे लगे कि जदयू कमजोर है।

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