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नार्वे का योहन्नस नंगे पांव बदरी-केदार यात्रा पर

सात समुंदर पार का एक गोरा छोरा नंगे पांव बदरी-केदार की तीर्थयात्रा पर निकल पड़ा है। यात्रा में उसके साथी हैं हरि व ओम नाम के दो घोड़े, जिन पर जरूरी सामान लदा है। पुराने पैदल तीर्थयात्रा मार्ग पर वह पहले ठहरने के लिए काली कमली धर्मशला ढूंढ़ता है न मिले तो तंबू तान कर रात गुजारता है।

पुराने पैदल मार्ग पर यात्रा बीते जमाने की बात हो चुकी है। मगर बुधवार को एक विदेशी सैलानी जब इस मार्ग पर नंगे पांव घोड़ों के साथ पहुंचा तो लोग अचरज में पड़ गए। नार्वे निवासी योहन्नस इसी को असली तीर्थ यात्रा मानता है। योहन्नस 6 दिन पूर्व ऋषिकेश से नंगे पांव दो घोड़ों के साथ यात्रा की सामग्री लेकर निकला है। साधुओं की सी जटाएं व बादामी दाढ़ी मूंछों से घिरे चेहरे वाला 20 वर्षीय योहन्नस यहां पुरानी काली कमली धर्मशाला की तलाश में भटकते नगर में पहुंच गया।

रघुनाथ मंदिर के निकट लोगों ने उसे बताया कि वह जिस पैदल मार्ग से चलता आ रहा है। उसी मार्ग पर पुरानी काली कमली धर्मशाला बनी है। पैदल तीर्थयात्रा के जमाने में काली कमली की यह धर्मशाला बदरी केदार यात्रा का प्रमुख पड़ाव भी थी। योहन्नस को बाह बाजार के छोर स्थित काली कमली की  जजर्र धर्मशाला में पहुंचकर काफी शांति मिली वहां उसे दोनों घोड़ों को बांधने की जगह भी मिल गयी।

पेशे से चित्रकार, मूर्तिकार व संगीतकार योहन्नस को हिन्दू धर्म व भारतीय संगीत में गहरी रुचि है। उसने बताया कि वह पैदल चलने में ही वह विश्वास रखता है। इसके लिए उसने ऋषिकेश में दो घोड़े खरीदे जिन्हें हरि और ओम नाम दिया।

यात्रा के बाद योहन्नस दोनो घोड़ों को बेचने की बात भी कहते हैं। इससे मिली रकम से वह अपने देश लौटने की टिकट खरीदेंगे। देवप्रयाग में घोड़ों की नाल ठुकवाने के लिए योहन्नस ने ऐसे आदमी की तलाश भी की जो आखिर उन्हें मिल गया। वयो वृद्ध तीर्थ पुरोहित राम कुमार जोशी बताते हैं कि पैदल तीर्थ यात्रा के समय घोड़े खच्चर काफी मददगार साबित होते थे।

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  • Web Title:नार्वे का योहन्नस नंगे पांव बदरी-केदार यात्रा पर