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कवि सम्मेलन में गीत की वापसी

‘दोके पहाड़े जैसी सीधी, एक से दस तक गिनती थी/पहली कक्षा के बच्चों की, विद्या मां से विनती थी।’ चित्तौड़गढ़ के गीतकार रमेश शर्मा देश में जहां कहीं कवि सम्मेलनों के मंच पर अपना यह गीत सुनाते हैं, श्रोताओं का दिल जीत लेते हैं। ‘बदरी बाबुल के आंगन जइयो/जइयो, बरसियो, कहियो कि हम हैं /तोरी बिटिया की आंखें।’ वरिष्ठ गीतकार कुंवर बेचैन अपना 32 वर्ष पुराना गीत अब जब भी मंच पर प्रस्तुत करते हैं तो बेसाख्ता वाह फूट पड़ती है। वरिष्ठ गीतकार सोम ठाकुर जब गाते हैं ‘हो गई रे परजा सयानी/उतर गया राजा का पानी’ तो श्रोता खड़े होकर दाद देने को मजबूर हो जाते हैं।
पचास के दशक में मंचों पर अवतरित हुए सोम ठाकुर और साठ के दशक में आए कुंवर बेचैन जैसे अनेक वरिष्ठ गीतकार बीच के दो ढाई दशकों से मंचों पर हिचकोले खाते रहे। पर पिछले दिनों बुलंदशहर के एक कवि सम्मेलन में कुंवर बेचैन, सोम ठाकुर और किशन सरोज जैसे वे गीतकार सुपरहिट हुए जिन्हें पिछले दो दशकों से हास्य और व्यंग्य के कवियों ने धकेलकर मंच के कोने में दुबका रखा था। ये श्रोता अभी तक हास्य और व्यंग्य के कवियों पर न्यौछावर थे। अब जब कवि सम्मेलन के मंचों पर गीतकारों की नए सिरे से ताजपोशी हो रही है तो जरूरत उन कारणों की पड़ताल की है, जिनके चलते गीतकार मंच से बाहर हुए थे।
बीस के दशक में बेतिया के गोपाल सिंह नेपाली और इलाहाबाद के हरिवंश राय बच्चन ने अपने गीतों के माध्यम से कवि सम्मेलनों को ‘शुद्ध साहित्यिक’ कवियों के हाथों से खींचकर लोकप्रिय काव्य परम्परा के रूप में स्थापित कर दिया। नेपाली के जिंदगी की धार को पहाड़ से उतार दे जैसे गीत न सिर्फ श्रोताओं को दीवाना बनाने के लिए काफी थे बल्कि उसने आने वाले समय के गीतों की फि़जि़योलॉजी ही बदलकर रख दी। 30 के दशक में एटा के बलवीर सिंह ‘रंग’, ऊदी (इटावा) के शिशुपाल सिंह ‘शिशु’ और जालौन के डॉ़ आनंद ने कवि सम्मेलन के मंच पर अपनी एंट्री ली और देखते ही देखते छा गए। 40 के दशक में नीरज, वीरेंद्र मिश्रा, रमानाथ अवस्थी, घनश्याम अस्थाना, मेघराज मुकुल और देवराज दिनेश ने अपने रोमानी गीतों से दर्शकों को खासा रिझाया। इसी दौर में सुमित्र कुमारी सिन्हा और ज्ञानवती सक्सेना ने भी गीतों की कवियित्री के रूप में ज़बरदस्त लोकप्रियता हासिल की। 50 के दशक में कैलाश वाजपेयी, आनंद मिश्रा, दुष्यंत कुमार, भारत भूषण हिंदी गीतों के नए रचनाकार के रूप में उदित हुए। इसी दौरान गाजियाबाद की कवियित्री डॉ़ रमा सिंह के गीतों ने देश भर में अपनी धूम मचाई। 60 का दशक कुंवर बेचैन, आत्मप्रकाश शुक्ल और किशन ‘सरोज’ जैसे गीतकारों को लेकर सामने आया और देखते ही देखते वे लोकप्रिय गीतों के प्रवक्ता बन बैठे। 70 के दशक में विष्णु सक्सेना और रामेंद्र त्रिपाठी जैसे नवांकुरों ने देश भर के मंचों पर अपने हस्ताक्षर जड़े लेकिन 80, 90 का दशक और 21वीं सदी के शुरूआती साल गीतकारों की दृष्टि से खासा बांझ साबित हुए। पहले गीत बाहर हुए फिर गीतकार।
पिछली सदी की शुरूआत के कवि सम्मेलनों का दायरा शहर के साहित्यिक रसिकों की बैठकी के भीतर ही सिमटा हुआ था। बनारस और इलाहाबाद से लेकर हिंदी भाषी प्रदेशों के अन्य साहित्यिक जागरूकता वाले शहरों के ये कवि सम्मेलन अत्यंत सीमित दायरे में होते थे। आज़ादी के बाद के वषों में हिंदी गीतों में सामाजिक चेतना के स्वर कमजोर होते चले गए। 60 और 70 के दशक में सामाजिक-राजनीतिक असंतोष अपने चरम पर था। पर हमारे गीतकार मंच पर ऐसे रूमानी गानों की तान टेड़े हुए थे, जो आम हिंदी भाषी श्रोता को कतई रुचिकर नहीं लग रहीं थीं। यही वजह है कि 70 के दशक का अंत होने से पहले ही मंचों से गीतों को विदाई गीत सुनने पड़ गए। नई सदी की बुङी शुरुआत के दरम्यान एक नया इत्तफाक हुआ। एक तरफ हिंदी गीतों के गजरों में रमेश शर्मा जैसे कवियों का उदय हुआ। सोम ठाकुर ने अपना कंगना खनकाना बंद करके विद्रोहों को अपना स्वर प्रदान किया तो कुंवर बैचेन ने बत्तीस साल पुरानी बाबुल के अंगना की बदरिया को मंच पर उतारा जिसे पुराना श्रोता भूल चुका था। इसी तरह विष्णु सक्सेना के गीतों में नई सदी की फुहार और संकट दोनों एक साथ दिखने लगे। कवियों के इन बदले हुए गीतों ने कवि सम्मेलन में मौजूद श्रोताओ के बीच एक नई बयार बहाई और हास्य और व्यंग्य के नाम पर नष्ट भ्रष्ट हो चुके मंचों को नए सिरे से लीपा पोता। आज जरूरत ऐसे ही गीतों की है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार और संस्कृतिककर्मी हैं

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