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एक आदिवासी बोध कथा

छोटे विद्वान ने बड़े विद्वान से पूछा- ननकू नामक आदिवासी की जो दुर्दशा है उसके लिए कौन जिम्मेदार है?
बड़े विद्वान ने कहा- इसके लिए ननकू ही जिम्मेदार है। छोटे विद्वान ने पूछा- वह कैसे?
बड़े विद्वान ने कहा- तो सुनो। ननकू सबसे पहले सरकार के पास गया। उसने कहा- सरकार, मेरे पास खाने को अन्न नहीं है, पहनने को कपड़ा नहीं है, शिक्षा नहीं है, सुविधाएं नहीं हैं, मेरी मदद करो। सरकार ने उससे चार कागजों पर अंगूठा लगवाया। उन योजनाओं से मिला पैसा बाबू खा गए। जंगल विभाग ने उससे बेगार करवाई। उसने शिकायत की तो पुलिस वालों ने उसे पीटा। घबराकर वह माओवादियों के पास गया।
माओवादियों ने उससे हथियार ढुलवाए, खाना बनवाया, परेड करवाई। पुलिस के साथ एकाध झड़प में वह मरते-मरते बचा। सो भागकर वह फिर सरकार के पास गया।
पुलिसवालों ने कहा- अच्छा, तो तू माओवादियों के साथ था। उसे उन्होंने जासूस समझकर पीटा, माओवादी समझकर पीटा, आदिवासी समझकर पीटा। उससे बर्दाश्त नहीं हुआ तो भागकर माओवादियों के पास गया।
माओवादियों ने कहा- अच्छा तू पुलिस के पास गया था। ले भुगत। उन्होंने भी उसे पीटा, इतना पीटा कि वह भागकर पुलिस के पास गया। पुलिसवालों ने उसे पीटा। फिर वह माओवादियों के पास गया तो उन्होंने उसे पीटा। फिर वह पुलिस वालों के पास गया। उन्होंने उसे पीटा। फिर वह माओवादियों के पास गया। पिट-पिट कर वह अधमरा हो गया। छोटे विद्वान ने पूछा- अगर वह यहां-वहां भागने की बजाए एक जगह टिक जाता तो क्या उसके लिए अच्छा होता।
बड़े विद्वान ने कहा- नहीं, तब भी वह उतना ही पिटता। पिटना तो उसके लिए अनिवार्य था।

 

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