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अपने से बहस करो न

कोई हमसे कहता है कि आप अच्छे दोस्त नहीं हैं? तब हम क्या करते हैं? जाहिर है हम तमाम तर्क जुटा कर यह जताने की कोशिश करते हैं कि हम अच्छे दोस्त हैं। उन्हें पूरी तरह से गलत साबित करने में जुट जाते हैं। लेकिन जब हम कभी निराश-हताश होते हैं, तब क्या करते हैं? तब हम कितने आराम से अपने बारे में कुछ भी मान लेते हैं। यह भी कि हमारे बस का कुछ नहीं। एक मामले में हम मानना नहीं चाहते। दूसरे में खट से मान लेते हैं।
दोनों ही मामलों में हम किसी बहस में नहीं पड़ते। बहस किसी और से नहीं। बहस अपने आप से। मसलन, अगर हम अच्छे दोस्त नहीं हैं, तो क्यों नहीं हैं? और जब मान लेते हैं कि हम कुछ नहीं कर सकते। या हम उस लायक नहीं हैं, तो खुद से बहस क्यों नहीं करते? आखिर एक बात के लिए हम ‘हिटबैक’ क्यों करते हैं? बिना कुछ सोचे विचारे। और दूसरी के लिए समर्पण के अंदाज में क्यों आ जाते हैं?
मिशेल जीलान अमेरिका की मशहूर टीवी एंकर और वेलनेस एक्सपर्ट हैं। वह पूछती हैं कि आखिर कितना वक्त हो गया, हमें खुद से बहस किए। या अपने से सवाल किए कि हम क्या हैं? या हम ऐसे क्यों हैं? हमने अपने बारे में खुद से सवाल क्यों नहीं पूछे कि आखिर हम क्या कर सकते हैं? या क्या कर सकते थे? फिर उसमें से हमारी कितनी सोच निगेटिव या पॉजिटिव थी। किसी भी मसले पर अपने आप से बहस करने की जरूरत है। उस बहस को हम जितना पॉजिटिव की ओर ले जा सकते हैं, ले जाना चाहिए। यों ही न तो कोई चीज मान लेनी चाहिए। और न ही उसे नकारने की जिद करनी चाहिए। अपने आपसे बहस करके तो देखिए। एक बदलाव आप अपने भीतर महसूस करेंगे।

 

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