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कुंभ के दुख

कुंभ मेले का हादसे और विशालता से प्राचीन रिश्ता रहा है। दुख की बात है कि वह रिश्ता इस बार भी टूट नहीं पाया। आखिरकार चार महीने से चले आ रहे इस सफल आयोजन पर आखिरी शाही स्नान के दिन सात लोगों की जान लेने का काला टीका लग ही गया। इसे काला टीका इसलिए कहा जाएगा कि जब छोटी सी जगह पर दो से ढाई करोड़ लोग एक दिन में स्नान करना चाह रहे हों तो कहीं न कहीं व्यवस्था चूक ही जाती है। फिर कुंभ के आयोजन पर अखाड़ों के बीच युद्ध होने और हजारों लोगों के मारे जाने का रक्तरंजित इतिहास भी रहा है। फिर भी उत्तराखंड सरकार ने जिस चाकचौबंद व्यवस्था का दावा किया था उसमें दरार पड़ गई। जाहिर है कि विराट प्रकृति और उसके ग्रहों की जिस गति और संक्रांति से अपना तादात्म्य विठाने के लिए कुंभ का आयोजन होता है उसके अनुरूप हम अपनी गति व्यवस्थित नहीं कर पाए। मनुष्य प्रकृति जैसा व्यवस्थित होने की कोशिश तो करता है लेकिन वह कहीं अपने अहंकार और कहीं अपनी नासमङी के कारण कर नहीं पाता।
देश के 13 अखाड़ों में सबसे बड़ा जूना अखाड़ा सबसे पहले शाही स्नान करता है। लेकिन पिछली बार की तरह इस बार भी उसका यह दावा विवादों में पड़ गया। सन 2004 में उज्जैन के कुंभ में जूना अखाड़े के मातहत रहने वाले आह्वान और अग्नि अखाड़े ने उनके साथ स्नान करने से मना कर दिया था तो उन्हें काफी मनाया गया था। इस बार जूना अखाड़े ने अपने निर्धारित समय पर घाट पर पहुंचने में विलंब किया तो ऐसी स्थिति बनी और उन्होंने शाही स्नान से ही इंकार कर दिया। इन स्थितियों के बावजूद अखाड़े कुंभ आयोजन के प्रमुख आकर्षण हैं और उनके बिना कुंभ के आयोजन का महात्म्य ही नहीं है। कहते हैं कि गंगा ने पृथ्वी पर आने से पहले विष्णु से पूछा था कि मैं मृत्युलोक में पवित्र कैसे रह पाऊंगी? इस पर भगीरथ ने वचन दिया था कि जब 12 साल बाद संन्यासी अपना पुण्य गंगा को समर्पित करेंगे तो उनकी पवित्रता बढ़ जाएगी। इसलिए कुंभ के सफल आयोजन की जवाबदेही प्रशासन के साथ उन अखाड़ों की भी बनती है जो तकरीबन 1200 साल से हिंदू धर्म और उसकी परंपरा के ध्वजवाहक हैं। अब उनका व्यवहार पहले जैसा टकराव या युद्ध वाला नहीं है और वे प्रशासन के समझाने बुझाने से मानते भी हैं। लेकिन कई बार जब ऐसे हादसे होते हैं तो उसमें विभिन्न स्तरों पर होने वाली चूकों का योगदान होता है। वैसे कभी हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर, कभी प्रतापगढ़ में कृपालु महाराज के आश्रम, तो कभी राजस्थान में श्रद्धालुओं के साथ भयावह हादसे होते रहते हैं। हरिद्वार की ही तरह वहां भी इन हादसों में सबसे ज्यादा महिलाएं और बच्चों ही शिकार होते हैं। लेकिन उन हादसों की तरह कुंभ के लिए यह नहीं कहा जा सकता कि प्रशासन को इस आयोजन की जानकारी नहीं थी या सुरक्षा व्यवस्था अपर्याप्त थी। कुंभ राष्ट्रीय ही नहीं एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन है। यह एक तरफ हमें खगोलीय गति से तो दूसरी तरफ हजारों सालों की परंपराओं और व्यापक भारतीय समाज से जोड़ता है। इस मौके पर दुनिया देखती है कि विभिन्न अखाड़ों में बंटा आधुनिक भारतीय समाज किस लोकतांत्रिक ढंग से अपने को चलाता और व्यवस्थित रखता है। इसलिए संकल्प लेना चाहिए कि कुंभ की यह चूक आगे नहीं होगी।

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