DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हकीकत यह है कि हम अंदर से खोखले हैं

शशि शेखर जी का लेख पढ़कर मैं काफी भावुक हो गया। हमारे जवान हमारी हिफाजत के लिए अपनी कुर्बानी तक दे देते है और हम लोग केवल दो आंसू गिरा कर इतिश्री कर लेते हैं। जो शहीद हो जाते हैं उनके परिवार वालों पर क्या गुजरती है? हमें तो बस अपने परिवार, धंधे से मतलब रखना है। कहने को तो हम आर्थिक प्रगति की ऊचाई पर हैं। हम चीन, अमेरिका से मुकाबला करने का दंभ भरते हैं। लेकिन हकीकत यह है की हम अंदर से खोखले हैं। जो अपने जवानों को ढंग की सुविधा मुहैया नहीं करा सकता उससे आप क्या अपेक्षा रखते हैं। आखिर ये आर्थिक प्रगति कब तक टिक पाएगी जब तक की हम अन्दर से मजबूत न हों। आये दिन कोई न कोई आतंकवादी घटना हो रही है। और हम उसको रोकने में नाकाम हैं। हम लोग चैन की नींद सो पाते हैं क्योंकि, हमारे प्रहरी रात भर हमारे लिए जागते हैं। अब समय आ गया है कि हम भी जागें।
बृजेश कुमार, हरिद्वार

लोकतंत्र पर हावी परिवारवाद
देश के नब्बे प्रतिशत सियासी दलों में परिवारवाद हावी है। हर सियासी दल वंशवाद की बेड़ी में फंसता जा रहा है। कश्मीर में अब्दुला, पंजाब में बादल, हरियाणा में बंशीलाल, तामिलनाडु में करुणानिधि के उत्तराधिकारियों के बारे में कौन नहीं जानता। उत्तर प्रदेश और बिहार में यादव बिरादरी के उत्तराधिकारी जगजाहिर है। देश में ऐसे दर्जनों राज्य है जहां के सियासी दलों के मुखिया एक ही कुनबे से बने रहे है। ठाकरे, सिंधिया, पंवार और देवगौड़ा भी वंशवाद की दौड़ में किसी से पीछे नहीं है। लेखक आशुतोष ने अपने लेख ‘वंशवाद में जकड़ा भारतीय लोकतंत्र’ में जिन तथ्यों के आधार पर सामंतवादी परंपरा पर टिप्पणी की है। उससे यह बात साफ झलकती है कि लोकतंत्र के नाम पर मुठ्ठी भर लोग सामंतवादी विचार की आड़ में अपना स्वार्थ सिद्घ कर रहे है जो आधुनिक लोकतंत्र प्राणाली के खिलाफ है। बेहतर होगा ऐसे सियासी दल अपने कुनबे की परिधि से बाहर निकलकर देश में सच्चें लोकतंत्र की स्थापना में अपना सहयोग करे।

राम अनुज, देहरादून

क्रिकेट की बाजीगरी
वर्तमान में क्रिकेट का एक ऐसा बुखार पूरे देश पर चढ़ा दिया गया है कि सरकारों को तमाम ज्वलंत समस्याओं से जनता का ध्यान हटाये रखने के लिए अपनी तरफ से कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। अमीरों की तो बात छोड़िये, महंगाई के पाटों के बीच पिसते मध्यम, गरीब तबके के लोग भी सब कुछ भूलकर क्रिकेट के पीछे पागल हुए जा रहे है। हैरत तो यह देखकर होती है कि जानलेवा महंगाई, शासनतंत्र का भारी भ्रष्टाचार और दूसरे मुद्दे अब चुनाव नतीजों को भी प्रभावित नहीं करते। शायद अभी पाप का घड़ा पूरा नहीं भरा है। मुलायम सिंह यादव का हाल में दिया गया बयान कि सब जुल्मों सितम सहकर भी जनता मौन क्यों है? आज की विषम परिस्थिति का सामयिक प्रकटीकरण है तो सभी राजनेता भी इसके जिम्मेदार है। जिनके विनाश के लिए एक वास्तविक दैवीय शक्ति संपन्न जननायक का इस धरा पर अवतरण अब होना ही है।
रणजीत सिंह, देहरादून

गंगा संरक्षण मात्र दिखावा
गंगा नदी को बचाने के वायदे उत्तराखंड की सरकार भी बढ़-चढ़कर करती आई है, लेकिन अब केन्द्र सरकार ने गंगा पर प्रस्तावित निर्माणाधीन तीन जल-विद्युत परियोजनाओं को बंद करने का निर्णय लिया है तो राज्य सरकार व भाजपा सहित अनेक के विरोधी स्वर गूंजने लगे है। हमारे समाज और सरकारों की मानसिकता ऐसी बन गई है कि हमें सब कुछ चाहिए-जल, जंगल, जमीन की चिंता है, गंगा मैया की चिंता है, बाघों को बचाने की चिंता है। एक तरफ ये है तो दूसरी और बड़े बांधों, बड़े उद्योग-कारखानों, वन्य जीव संरक्षित क्षेत्रों में पर्यटकों की भीड़ बढ़ाने को भी बेचैनी दिखती है। हम तय करें कि वास्तव में हमें इनमें से किसको चुनना है।
कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा

नये वित्त वर्ष की नयी सौगात
नये वित्त वर्ष के आगमन के पहले दिन से ही तीन नये नियमों को व्यवहारिक स्वरूप मिलेगा। सर्वप्रथम शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार के रूप में प्रभावी होगा। जो देश में निरक्षरता को दूर करने में एक ओर महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही 2011 की जनगणना का कार्य प्रारम्भ हो जायेगा। जिससे विकास की नयी नीतियों तथा देश की सही दशा-दिशा के आकलन में सहायता मिलेगी। नये वित्त वर्ष का सबसे आकर्षक पहलू सभी के लिये पैन आवश्यक किया जाना है, अन्यथा टीडीएस के रूप में 20.4 प्रतिशत का वहन करना होगा। यह कदम इसलिए भी स्वागत योग्य है क्योंकि इससे काले धन पर कुछ हद तक अंकुश लगेगा तथा सरकार प्राप्त इस कर को देश के विकास में लगाया जा सकता है। ऐसे कदमों से देश की आर्थिक व सामाजिक नीतियों को नया बल मिलेगा।
राहुल त्रिपाठी, देहरादून

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:हकीकत यह है कि हम अंदर से खोखले हैं