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एनसीईआरटी की किताबों का संकट -अभिभावक परेशान

एनसीईआरटी अपने पुराने र्ढे पर चल रही है। जिले के स्कूलों में नए सत्र की पढ़ाई शुरू हो चुकी है लेकिन अभी तक एनसीईआरटी की कई प्रमुख किताबें बाजार में नहीं आई हैं। किताबों की किल्लत के बीच पढ़ाई को लेकर बच्चें और अभिभावक, दोनों ही परेशान हैं। मौका देखते हुए स्कूलों ने एनसीईआरटी की किताबों की जगह निजी प्रकाशकों की किताबें लगानी शुरू कर दी हैं।


हर वर्ष की तरह एनसीईआरटी की किताबों का संकट सत्र शुरू होने के बाद भी बाजार में बना हुआ है। आधा अप्रैल बीत गया है और पढ़ाई के लिए काफी अच्छी मानी जाने वाली एनसीईआरटी की कई प्रमुख किताबें अभी तक पुस्तक विक्रेताओं तक नहीं पहुंची हैं। सेक्टर-18 स्थित गलगोटिया बुक स्टोर के पुस्तक विक्रेता ने बताया कि कक्षा चार, सात और कक्षा आठ की कई किताबें नहीं आई हैं। इनमें अंग्रेजी गणित और विज्ञान जैसी प्रमुख किताबें भी शामिल हैं। यह किताबें सिर्फ गलगोटिया बुक स्टोर में ही नहीं बल्कि पूरे जिले की किसी भी दुकान में नहीं हैं। सेक्टर-8 स्थित ए वन बुक स्टोर के पुस्तक विक्रेता ने बताया कि कोई भी कक्षा ऐसी नहीं है, जिसकी 20 फीसदी एनसीईआरटी की किताबें भी मौजूद हों। कक्षा पांच, छह, सात, आठ और नौ की गणित और विज्ञान की किताबें नहीं है। हर वर्ष किताबें आते-आते सितंबर बीत जाता है और अभिभावक व बच्चाे किताबों के लिए दौड़ते रहते हैं। एनसीईआरटी की लचर व्यवस्था का फायदा उठाते हुए स्कूलों में निजी प्रकाशकों की किताबें एनसीईआरटी की किताबों का स्थान लेने लगी हैं। रॉकवुड स्कूल के निदेशक सुनित टंडन ने कहा कि एनसीईआरटी का सेलेबस निजी प्रकाशकों के पास भी मौजूद होता है। सेलेबस के हिसाब से हर वर्ष निजी प्रकाशक किताबों को छापते हैं और नया सत्र शुरू होने से पहले यह किताबें मिल भी जाती हैं। कोर्स पिछड़ने से बचने के लिए निजी प्रकाशकों की किताबें लगाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

‘‘छोटी कक्षा की किताबों का पूरा सेट 2200 से 2500 रुपए में मिलता है जबकि एनसीईआरटी की किताबें इससे सस्ती होती हैं। बाजार में एनसीईआरटी की किताबें नहीं मिलने की वजह से निजी प्रकाशकों की किताबें बच्चाों के लिए खरीदनी पड़ती हैं।’’
                                          राहुल कुमार, अभिभावक, कैंब्रिज स्कूल

मुनाफे का खेल, हर साल बदल जाती हैं किताबें
निजी प्रकाशकों की किताबों से स्कूल मोटा मुनाफा कमाते हैं। सत्र शुरू होने से पहले ही निजी प्रकाश लुभावने कमीशन के पेशकश करते हुए अपनी किताबों के सैपल स्कूलों को देते हैं। 10-15 प्रकाशक स्कूल के प्रमुख को लुभाने के लिए होड़ लगाते हैं। स्कूल के प्रमुख को जिस प्रकाशक की किताब पसंद आ जाती है, उसकी किताब स्कूल में लगा ली जाती है। अगले सत्र में प्रकाशक की किताब का कांट्रेक्ट रद्द भी किया जा सकता है। इसके स्थान पर किसी नए निजी प्रकाशक की किताब लगा दी जाती है। ऐसे में यदि एक स्कूल में एक ही परिवार के दो-तीन बच्चाे पढ़ रहे हैं तो छोटे बच्चाे के लिए बड़े बच्चाे की किताब काम आती है।

‘‘किताबें अगर नहीं मिल रही हैं तो पुस्तक विक्रेता या स्कूल के प्रमुख इसकी जानकारी एनसीईआरटी को लिखित तौर पर दें। जानकारी मिलने पर इस बात का पता लगाया जाएगा कि किस कक्षा की किताब, क्यों बाजार में नहीं है।’’
                                                            एनसीईआरटी

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