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शास्त्रीय संगीत में निवेश की जरूरत: वसीफुद्दीन डागर

शास्त्रीय संगीत में निवेश की जरूरत: वसीफुद्दीन डागर

संगीत को आत्मा का भोजन बताते हुए जाने माने ध्रुपद गायक वसीफुद्दीन डागर ने कहा कि हमारे दिलों ने शास्त्रीय संगीत को खास तबके तक सीमित कर दिया गया है, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है।

वसीफुद्दीन डागर ने एक खास बातचीत में कहा कि शास्त्रीय संगीत को रेडियो और टेलीविजन में काफी कम जगह दी जाती है। देश भर में टेलीविजन के संगीत से संबंधित तकरीबन 40 चैनल हैं, लेकिन इनमें शास्त्रीय संगीत को उतना स्थान नहीं दिया जाता जितना दिया जाना चाहिए। इसकी बजाय फिल्मी, गैर फिल्मी तथा विदेशी संगीत को जगह दी जाती है।

हालांकि, उन्होंने कहा कि शास्त्रीय संगीत किसी का मोहताज नहीं हैं। उदाहरण के लिए ध्रुपद हमारे पहले भी था और हमारे बाद भी रहेगा। यह सहेजने की कला थी और इसे हमारे पूर्वजों ने सहेजा है तभी तो हम आज भी सदियों पुरानी बंदिशें सुन पाते हैं। मियां तानसेन के गुरू स्वामी हरिदास के वंशज डागर ने कहा कि संगीत आत्मा का भोजन है। इसे खास तबके तक समेटा नहीं जा सकता।

उन्होंने कहा कि शास्त्रीय संगीत को देश-विदेश में अधिक लोगों तक पहुंचने में इंटरनेट मदद कर रही है। तकनीकी के विकास के चीजें लोगों तक आसानी से पहुंच जाती हैं। उन्होंने कहा कि हमारे देश में उसी चीज की कद्र होती है, जो विदेशों में लोकप्रिय हो जाती है। जैसे दक्षिण भारत का मार्शल आर्ट चीन और जापान में लोकप्रिय होने के बाद हमारे देश में पहचान बना पाया।

डागर ने कहा कि आधुनिक युग की युवा पीढी़ बहुत स्मार्ट है और वह जल्द से जल्द सब कुछ पाना चाहती है। मगर क्रेशकोर्स से शास्त्रीय संगीत नहीं सीखा जा सकता। उन्होंने कहा कि भारत सांस्कृतिक रूप से काफी समृद्ध है और हम अपने पास उपलब्ध चीजों को संभाल नहीं पा रहे हैं। यह एक बड़ा कारण है कि शास्त्रीय संगीत को वाजिब स्थान नहीं मिल पा रहा है। शास्त्रीय संगीत के प्रति हमें वृहद दृष्टिकोण रखना होगा।
 उन्होंने कहा कि जिन फिल्मी गानों में रागों का अंशमात्र भी होता है, वे तेजी से लोकप्रिय हो जाते है। इसके बावजूद फिल्मों में शास्त्रीय संगीत के नकारात्मक पहलू को ही दिखाया जाता है।

शास्त्रीय संगीत के कुछ घरानों में ही सिमटे होने के बारे में उन्होंने कहा कि यदि पंडितों और उस्तादों ने लोगों को शास्त्रीय संगीत सिखाया ही नहीं तो फिर देश के तमाम विश्वविद्यालय कैसे संगीत पर डिग्रियां बांट रहे हैं। उन्होंने कहा कि औद्योगिक घराने राजा महाराजाओं से अधिक धनवान है और समय की मांग है कि इन्हें आगे आकर शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में निवेश करना चाहिए। इससे दूरदराज के कलाकार को सही स्थान मिल पायेगा।
 
उन्होंने कहा कि समय के साथ हर चीज का विस्तार घटा है। हम मानते हैं कि कैपसूल में हर चीज आ सकती हैं, लेकिन शास्त्रीय संगीत किसी कैपसूल में नहीं समा सकता। डागर ने कहा कि लोग गंभीर होने की बात तो करते हैं लेकिन शास्त्रीय संगीत को लेकर कोई गंभीर नहीं है। इसलिए हमें जागरूक रहना होगा और असलियत को बरकरार रखना होगा।

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