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स्कूलों का शोषण का जाल, मां-बाप हुए बेहाल

स्कूलों का शोषण का जाल, मां-बाप हुए बेहाल

शिक्षा को प्रगति की कुंजी कहा जाता है। यह उम्मीद की जाती है कि शिक्षा से छात्र का चहुंमुखी विकास होगा, जिससे आगे चलकर वह देश के विकास में अपना योगदान करेगा, लेकिन आज शिक्षा उद्योग का रूप ले चुकी है और विद्या के मंदिर विद्यालयों की भव्य इमारतें बच्चों का सुनहरा भविष्य नहीं दिखाई दे रहा है बल्कि वे अभिभावकों के शोषण का एक माध्यम बन गई हैं।

विद्यालयों में नए सत्र की शुरुआत के साथ ही उनमें दाखिले के लिए भगीरथ प्रयास, भारी फीस और डोनेशन ने अभिभावकों के साथ मानसिक और आर्थिक शोषण का खेल खेलना शुरू कर दिया है। पिछले सत्र में अभिभावकों और निजी विद्यालयों के बीच फीस वृद्धि को लेकर मामला इतना बढ़ गया था कि अभिभावकों को अदालत का सहारा लेना पड़ा था। इसके बावजूद नए सत्र में विद्यालयों में फीस बढ़ा दी गई है।

निजी विद्यालयों का रुतबा यह है कि उन्होंने वंचित वर्ग के 25 फीसदी बच्चों को अपने यहां मुफ्त शिक्षा देने के सरकारी आदेश को चुनौती देते हुए असंवैधानिक करार दिया और अदालत में भी चले गए।

किसी कवि की ये पंक्तियां अभिभावकों की मनोव्यथा को उजागर करती हैं।
फूलों से नाजुक बच्चे, कंधों पर ढोते हैं बस्ते
झुकी कमर मासूम निगाहें, स्कूलों की लंबी राहें।
कैसे धन को लोग लुटाए, चंद अमीर सफल होते हैं,
बाकी सब भूखे सोते हैं।

अभिभावकों का आरोप है कि निजी स्कूल प्रबंधक शिक्षा को व्यापार बनाने पर तुले हैं। अपने लाभ के लिए हर साल पाठ्यक्रम में बदलाव करना, कथित रूप से चलाए जा रही दुकानों और कुछ पुस्तक विक्रेताओं को मोटे कमीशन के लालच में अपने स्कूल की कॉपी-किताब बेचने का ठेका देकर अभिभावकों को वहीं से उन्हें खरीदने के लिए मजबूर करना और समय-समय पर होने वाले समारोहों और पिकनिक के नाम पर मोटी रकम वसूलना अभिभावकों का आर्थिक और मानसिक दोनों तरह से शोषण करना है।

एक पुस्तक विक्रेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि कुछ नामचीन स्कूल प्रबंधन भारी कमीशन के तहत कुछ पुस्तक विक्रेताओं को बिक्री का ठेका दे देते हैं। इन स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकें बाजार में कहीं भी उपलब्ध नहीं होती हैं, इसलिए केवल एक या दो दुकान पर इनकी उपलब्धता से साफ पता चल जाता है कि स्कूल प्रबंधन ने निजी स्वार्थ के लिए ऐसा किया है। विक्रेता इस धंधे में 20 से 25 फीसदी मुनाफा कमाता है। उसका कहना था कि यदि वह मुनाफा नहीं कमाएगा तो स्कूल का कमीशन कहां से देगा।

अभिभावकों का यह भी आरोप है कि शिक्षा माफिया सरकार से स्कूल खोलने के लिए सस्ती दर पर जमीन खरीदने के लिए सभी शर्तें मानने का वचन देते हैं, लेकिन बाद में स्कूल तैयार होने पर वे किसी भी शर्त को इसलिए मानने से इनकार कर देते हैं कि उनका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। इसकी वजह है कि इनमें कुछ राजनेता, बड़े उद्योगपति और ऊंचे रसूख रखने वाले लोग शामिल होते हैं।

उनका कहना है कि सरकार शिक्षा के क्षेत्र में अमीर और गरीब के बीच खाई को पाटना चाहती है, लेकिन शिक्षा माफिया क्या इसे सफल होने देंगे। उनके विद्यालयों की फीस और दूसरे खर्चे इतने ज्यादा होते हैं कि गरीब बच्चों के अभिभावक मन मसोस कर रह जाएंगे। अभिभावक यह आरोप भी लगा रहे हैं कि स्कूल प्रबंधन बसों के किराए बढ़ने के साथ ही उनके साथ बातचीत किए बिना ही स्कूल वाहन का किराया वसूलता है और उच्चतम न्यायालय के उस आदेश को नजरअंदाज कर देता है, जिसमें कहा गया है कि बस में एक भी बच्चों के रहने पर एक टीचर का होना अनिवार्य है।

अभिभावक अनंत सिंह का कहना है कि कुछ लिखने से इन स्कूलों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। जितना बड़ा स्कूल, परेशान करने के तरीके भी उतने। भले ही सरकार नर्सरी स्कूलों में दाखिले के लिए लाख कायदे बनाती रहे, लेकिन निजी स्कूल अपने तुगलकी फरमान अभिभावकों पर लादने से बाज नहीं आते। शिक्षा माफियाओं ने शिक्षा को उद्योग बना दिया है, जो दिल्ली में नहीं, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में भी फैले हुए हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने 1999 में आदेश दिया था कि निर्धारित मद के अलावा अन्य किसी मद में बच्चों से शुल्क नहीं लिया जा सकता। ऐसा करने वाले विद्यालय का एनओसी तक रद्द करने का प्रावधान है। लेकिन तमाम स्कूल प्रबंधन उस आदेश का उल्लांघन कर रहे हैं। स्कूलों की मिलीभगत से दाखिला दिलाने में भी ठेके का काम चलता है। डोनेशन का भी धंधा स्कूलों में अलग-अलग नियमों के कारण फलफूल रहा है।

सिंह का कहना है कि पुस्तकों में यह पढ़ना अच्छा लगता है कि शिक्षा प्रगति की कुंजी है। यह केवल व्यक्ति का ही सशक्तिकरण नहीं करती, बल्कि राष्ट्र को भी मजबूत बनाती है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इस कुंजी को प्राप्त करना ही आज सबसे बड़ी समस्या है। निजी स्कूलों की चमक-दमक की तरह उसकी शिक्षा भी महंगी है जो गरीब के लिए दिवास्वप्न है। मध्यम श्रेणी के अभिभावक स्कूलों की मांगों को पूरा करते करते आर्थिक और मानसिक रूप से रूग्ण हो जाते हैं।

एक अन्य अभिभावक रघुवीर त्यागी का कहना है कि बराबरी और विकास लाने के लिए जिस भावना के तहत शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया है, उसे पाने के लिए गुणवत्ता में फर्क को मिटाना होगा। यह संभव नहीं दिखलाई पड़ता। निजी स्कूलों में मोटी फीस के अभाव में गरीब बच्चे नहीं पढ़ सकते, जबकि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर पहले से ही बहुत खराब है। इसलिए उसके माध्यम से शिक्षा के मौलिक अधिकार का फायदा उठाने वाले बच्चों उन बच्चों की तुलना में बहुत कमजोर शिक्षा पा रहे होंगे जो समान्य अधिकार के तहत विशिष्ट संस्थानों में दाखिल होते हैं।

उन्होंने कहा कि 1998-99 में विख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने देश की स्कूलों की व्यवस्था को बुरी हालत में बताया था और आज भी स्कूलों की वही हालत है। शिक्षा माफिया केवल अभिभावकों का ही शोषण नहीं कर रहे हैं बल्कि अपने स्कूलों में शिक्षा देने वाले टीचरों का भी खुल कर शोषण कर रहे हैं। नाम न छापने की शर्त पर अलग शिक्षिकाओं ने बताया कि अभिभावक तो हो हल्ला मचाकर अपना आक्रोश जता लेते हैं पर हम तो वह भी नहीं कर सकते। बेरोजगारी के दौरान जितना मिल जाए उसी में गुजारा करना पड़ता है।

सुनीता सहगल (परिवर्तित नाम) का कहना है कि स्कूलों के रजिस्टर में कुछ और भुगतान दिखाया जाता है और हस्ताक्षर भी उतने पर ही कराया जाता है लेकिन हकीकत ठीक उसके विपरीत होती है। मुंह खोलने का मतलब है कि नौकरी से छुट्टी। बडे़ नाम वाले स्कूलों में अभिभावकों से फीस और अन्य चीजों के नाम पर मोटी फीस वसूली जाती है। स्कूलों में मनमानी फीस बढा दी जाती है। फीस बढाने के बावजूद शिक्षकों के वेतन में किसी प्रकार की बढोत्तरी नहीं की जाती। हर स्कूल में शिक्षकों के शोषण का अलग अलग तरीका है।

समाजशास्त्र से एमए कर रही छात्रा अनु का कहना है कि देश में सभी साक्षर होंगे, यह सोच कर गर्व होता है। यदि सचमुच ऐसा होता है तो भारत भी विकसित देशों की कतार में जल्द ही खड़ा हो जाएगा। भारत 135 देशों की कतार में खड़ा हो गया है, जहां शिक्षा के अधिकार का कानून है। कहीं छह साल तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है तो कहीं दस साल तक।

अनु का यह भी कहना है कि लाखों स्कूल और विश्वविद्यालय के जरिए हम बच्चों को सिर्फ साक्षर ही बना पाए हैं शिक्षित नहीं। शिक्षा के लिए जिस चेतना की जरूरत है, उसे हम उनमें नहीं जगा पाए हैं। हमारे युवा स्नातक तो हैं, लेकिन जिस मौलिक शिक्षा की परिकल्पना महात्मा गांधी, गौतमबुद्ध, महावीर और संत कबीर जैसों ने की थी, वह आज हमारे सिस्टम से ही गायब है।

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