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बीएचयू छात्र गरीब कामगार बच्चों को सिखा रहे ‘एबीसीडी’

‘चलो भई चलो क्लास का टाइम हो गया। आज मासी तुम लोगों को टॉफी भी देंगी।’ जी हां ये किसी इंजीनियरिंग या मेडिकल की कक्षा के लिए दोस्तों की कॉल नहीं बल्कि बीएचयू आईटी के छात्रों द्वारा कामगार बच्चों के लिए लगाई जाने वाली ‘इन्फार्मल क्लास’ के लिए बुलावा है।

आईटी के तीन दर्जन से अधिक छात्र प्रतिदिन पारी-पारी से संस्थान के छात्रवासों की मेस में काम करने वाले बच्चों को इकट्ठा करते है। फिर हैदराबाद गेट स्थित एक शिक्षक के घर वंचित वर्ग से आए बच्चों के लिए शुरू होती है एक स्पेशल क्लास। इसमें सहयोग करती है शिक्षक की वाइफ जिन्हें आईटियंस प्यार से ‘मासी’ के नाम से पुकारते है।

बीटेक फर्स्ट ईयर की मोनिका, काजल, पूजा, अंतिमा, ईशा, शर्मिष्ठा, रोली और नितीष के अलावा सेकंड ईयर के रोहित प्रतिदिन शाम को 3.30 बजे से 5 बजे तक बच्चों को पढ़ाते है तो आशीष, विजय, वरुण, दिवाकर समेत तीन दर्जन से अधिक छात्र सीवी रमन, मोर्वी, धनराजगिरी, लिम्बडी, राजपुताना, डे, विश्वेसरैया, विवेकानंद, विश्वकर्मा आदि आईटी के छात्रवासों से बच्चों को इकट्ठा करने का काम करते है। इस काम के प्रति छात्रों की लगन और उत्साह ऐसा की परीक्षा के दौर में भी वो बच्चों को क्लास रूम तक लाना नहीं भूलते। शनिवार को छुट्टी रहती है। विभिन्न अवसरों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते है तो क्लास में बेहतर प्रदर्शन पर बच्चों में टॉफी, पेन, कॉपी आदि भी दी जाती है।

टीचर्स ने अप्रैल के अंत में छात्रों को बाबतपुर हवाईअड्डे पर हवाईजहाज दिखाने का भी वादा किया है। अलवर राजस्थान की काजल कहती है कि हमारे सीनियर्स मेस में झाड़, पोछा समेत छोटे-मोटे काम करने वाले बच्चों को पढ़ाते थे। बीएचयू में एडमिशन के बाद मुझे पता चला तो मैंने भी पढ़ाना शुरू कर दिया। इन बच्चों को पढ़ाकर काफी संतुष्टि मिलती है। हर साल छात्र के साथ टीचर्स तो बदलते है लेकिन क्लास और जज्बा पिछले आठ सालों से बरकरार है।

चार वर्ग में होती है पढ़ाई
मासी की घर चलने वाली इन्फार्मल कक्षा में बच्चों को चार वर्ग में बांटकर पढ़ाया जाता है। जीरो लेवल में वे बच्चे शामिल होते है जिन्हें एबीसीडी भी नहीं बाती। फर्स्ट लेवल पर वैसे बच्चे है जिन्हें एबीसीडी का तो ज्ञान है लेकिन शब्द नहीं बना पाते। सेकंड लेवल पर वे बच्चे है जो पांचवी तक पढ़े और थर्ड लेवल में कक्षा आठ तक की पढ़ाई करने वाले बच्चों को रखा जाता है। मासी ने बताया कि इस वर्ष से नवोदय विद्यालय में प्रवेश के लिए भी बच्चों की तैयारी कराई जा रही है।

‘मैं तो पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनूंगा’
राजपुताना छात्रवास में खाना खिलाने वाले कल्लीपुर के 16 वर्षीय मोहम्मद रफीक ऐसे छात्र है जिन्हें बुलाना नहीं पढ़ता। रफीक मासी के यहां नियमित रूप से पढ़ने आते है। बोले कक्षा पांच के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। अब दीदी लोग फिर से पढ़ा रही है। मैं पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनूंगा। कुछ ऐसे की विचार है देवरिया जिले के टुनटुन के। स्कूली शिक्षा से वंचित 14 वर्षीय टुनटुन विश्वेसरैया हास्टल की मेस में काम करते है। कहा कभी स्कूल जाने का मौका नहीं मिला। मासी के यहां आकर बहुत अच्छा लगता है।

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