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दो टूक (14 अप्रैल, 2010)

कानून बनाने वाले अगर खुद उसे तोड़ने लगेंगे तो व्यवस्था पर कौन भरोसा करेगा? राजधानी में अतिक्रमण और अवैध निर्माण के मामले में निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी पीछे नहीं हैं। हालांकि इस मामले में देश का कोई हिस्सा अछूता नहीं कहा जा सकता है।

जनता के बीच से चुनकर आए अधिकतर जनप्रतिनिधि पहला कार्यकाल पूरा होते-होते भारी संपत्ति जोड़ लेते हैं। दूसरा कार्यकाल मिल गया तो उनका सैकड़ों करोड़ का स्वामी बनना लगभग तय है।

यह दीगर बात है कि इनमें ज्यादातर अपने पेशे को समाजसेवा के रूप में प्रचारित करना पसंद करते हैं। जिस देश में लगभग आधी आबादी भरपेट भोजन नहीं पाती, वहां चुने हुए प्रतिनिधियों की खुली लूट-खसोट, वोट देने वालों को शर्मसार करती है।

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