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अंबेडकर की चिंता थी नारी समता

आज डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म दिन है। लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्षधर और संविधान निर्माता के रूप में उनका स्मरण गौरवान्वित करने वाला है। एक व्यक्ति एक मत के प्रावधान ने एक सीमा तक सत्ता परिवर्तन के रक्तरंजित असंतोष भरे रास्तों से बचा कर शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण का विकल्प दिया है। जिसकी पारदर्शिता, विश्वसनीयता क्रांति के अतिवाद और सामाजिक आतंकवाद को समाप्त कर सकती है।

स्त्री और अछूतों की समानता तथा बच्चों की शिक्षा को लेकर उनकी चिंताएं आज के समय में जब महिला आरक्षण बिल विमर्श में है और बाल शिक्षा अधिकार बिल पास हो गया है और अधिक प्रासंगिक हो गई है। वे महिला अधिकारों के लिए हिन्दू कोड बिल के निर्माता थे।

तलाक का अधिकार, पुनर्विवाह और महिलाओं के लिए संपत्ति में अधिकार के पक्षधर थे। साथ ही दलित वर्ग की महिलाओं को समानता और भागीदारी दिलाने के बारे में उनकी चिंताएं कम नहीं थी। 1942 में जब उन्होंने ‘स्टेट एंड माइनोरिटीज’ नामक पुस्तक लिखी थी उन्हें आशंका थी कि शायद भारत के संविधान निर्माण का कार्य उन्हें न सौंपा जाए।

स्त्री समानता के प्रश्न पर वे समाजवादी रुख अपनाते थे। वे लोकतंत्र में रानी और मेहतरानी का अंतर हटा कर समानता को व्यवहारित होता देखना चाहते थे। इसके संदर्भ में 18, 19 और 20 जुलाई 1942 को नागपुर में हुई डिप्रेस्ड क्लासेस वूमैन कांफ्रेंस की रिपोर्ट देखी जा सकती है। यह कांफ्रेंस समालोचना बाई डोंकरे की अध्यक्षता में संपन्न हुई थी। इसमें 20 हजार महिला प्रतिनिधि उपस्थित थीं।

बतौर विशेष अतिथि डॉ. अंबेडकर ने इसे संबोधित कर कहा था- ‘यदि महिलाएं आश्वस्त हो जाएं तो वे भारतीय समाज की दशा सुधार सकती हैं। मैं इसका साक्ष्य स्वयं अपने अनुभव से दूंगा। इसी आशय से मैं महिलाओं के प्रश्न पुरुषों के बीच उठाने जा रहा हूं। मुझे खुशी होगी जब मैं असेंबली में स्त्री-पुरुष दोनों को समान प्रगति करते देखूंगा। वही प्रगति हमारी सच्ची प्रगति होगी।’

चार साल के भीतर 11 अप्रैल 1947 को हिन्दू कोड बिल सदन में पेश किया गया था। इसके बाद अंबेडकर ने लिखा था- ‘चार वर्ष जीने के बाद इस बल की हत्या कर दी गई। जिस पर किसी ने आंसू भी नहीं बहाए।’

संपादक के रूप में अंबेडकर अपनी स्त्री पक्षधरता पहले ही जाहिर कर चुके थे। बहिष्कृत भारत में उन्होंने कहा था- हिंदू लोग देवताओं के बाद स्त्री को पूजनीय मानते हैं, पर अस्पृश्य बहनों को बेइज्जत करके उन्होंने क्या किया? ‘गाय’ की आत्मा मानते हैं लेकिन स्त्री में भी आत्मा है ऐसा क्यों नहीं सोचते। स्त्री उनके भोग और आनंद की वस्तु भर क्यों है? इसलिए उसे वस्त्रभूषणों, श्रृंगार सौंदर्य से तैयार किया जाता है। या फिर वह घर की लक्ष्मी है।

भविष्य में देश के बच्चे सुशिक्षित हों इसलिए वे वर्तमान की बालिकाओं की शिक्षा पर जोर दे रहे थे। अंबेडकर के नेतृत्व में 6 अप्रैल 1934 को बोरगांव वर्धा में हुई ‘अछूत परिषद’ का रिकार्ड देखा जा सकता है। इसमें बाल शिक्षा पर ही जोर दिया गया था। इसलिए कि अशिक्षित स्त्री अपनी भागीदारी नहीं निभा सकती। कुटुम्ब नियोजन, संतति नियमन (बर्थ कंट्रोल) संबंधी एक प्रस्ताव 10 नवम्बर 1938 को पीजी रोहन के माध्यम से मुंबई विधानसभा में डॉ. अंबेडकर ने रखा था।

हाल ही में बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार बनाया गया है। डॉ. अंबेडकर ने ‘शिक्षित बनो’ का नारा दिया था। शिक्षा पर उन्होंने बाकी नेताओं से अधिक जोर दिया है। यदि सरकारें इस अधिकार को कोई ठोस आधार दे सकती हैं तो यह अंबेडकर के सपनों के अनुकूल होगा ही और गांधी-लोहिया और नेहरू के समाजवाद के प्रतिकूल नहीं होगा।

इस पर दलित समाजों और अंबेडकरवादी सियासत में भी कोई उत्साह क्यों नहीं दिखाई दे रहा? क्या इसकी वजह अतीत का कटु अनुभव नहीं रहा है? क्योंकि अस्पृश्यता के विरुद्ध कानून भी है और समाज में अस्पृश्यता भी है। अनुसूचित जाति अत्याचार निवारण अधिनियम भी है और उत्पीड़न भी जारी है। ऐसे में सरकार की कथनी से ज्यादा करनी महत्वपूर्ण है। अधिक कहने और ढेरों कानून बना देने से अच्छा कुछ कर दिखाना होता है। इस संदर्भ में डॉ. अंबेडकर की किताब ‘गांधी और कांग्रेस ने अछूतों के लिए क्या किया’ आज भी प्रश्नवाचक  भूमिका में है।

मनुवादियों ने अंबेडकर को आधुनिक मनु कहा और सत्यबोध हुदलीकर जैसे पत्रकारों ने ज्ञान देव कहा। मौरेश्वर वासुदेव दौंदे जैसे लेखकों ने उन्हें हिन्दुस्तान के बिकर टी वाशिंगटन की उपमा दी। नवयुग पत्रिका 1947 ने उन्हें मार्टिन लूथर किंग ही कहा। यह सब उन्हें अपनी मौलिक सेवाओं के कारण मिला। लेकिन जैसा मौलिक योगदान उन्होंने राजनीति में दिया, शिक्षा व्यवस्था में किया, जातिभेद का उन्मूलन नामक शोध द्वारा किया और मूकनायक, बहिष्कृत भारत, समता, जनता और प्रबुद्ध भारत द्वारा पत्रकारिता-संस्थाओं को जन्म दिया, वैसा कोई मौलिक काम स्वधर्म के क्षेत्र में वे नहीं कर सके।

इसलिए उन्हें किसी ने अछूत का बुद्ध नहीं कहा। धर्म के मामले में गैरमराठी खासकर हिन्दी, पंजाबी दलित साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव वैसा नहीं है। यहां रैदास, कबीर की धारा अंबेडकर की सेवाओं के प्रति कृतज्ञ रहते हुए अपने मौलिक चिंतन को विकसित करती आ रही है।

पंजाब के गदरी बाबा, बापू मंगूराम मंगोवालिया आदिधर्मी आंदोलन का वीणा उठाए थे। वह 1931 की जनगणना में शामिल होने के कारण डॉ. अंबेडकर के संज्ञान में होना अपेक्षित था। स्वामी अछूतानन्द आदिहिन्दू आंदोलन की मार्फत अपने संत मत का भी बराबर प्रचार प्रसार कर रहे थे और डॉ. अंबेडकर के साथ सहयोग कर रहे थे।
अंबेडकर के व्यक्तित्व एक पक्ष पत्रकार पक्ष भी है। मूकनायक पत्र को क्षत्रपति शाहू महाराज की आर्थिक सहायता मिली थी। दत्तोबा संतराम पवार नाक एक निम्न जाति के सामाजिक कार्यकर्ता ने महाराज की अंबेडकर से मुलाकात कराई थी। पवार के माध्यम से ही महाराज ने ढाई हजार की धनराशि अंबेडकर को भेजी थी।

यह बात सच है कि डॉ. अंबेडकर का संघर्ष सामाजिक अधिक था, वैयक्तिक कम। इस कारण ऑर्थोडॉक्स विचारों के विरुद्ध कतिपय गैरदलितों का भी सहयोग मिला था। सबसे ज्वलंत उदाहरण बालगंगाधर तिलक के सुपुत्र श्रीधर बलवंत तिलक का है। बलवंत डॉ. अंबेडकर के प्रिय मित्र थे। 14 सितम्बर 1927 को डॉ. अंबेडकर द्वारा स्थापित ‘समाज समता संघ’ को बलवंत ने न केवल सहयोग दिया था, बल्कि पूना शाखा का उपाध्यक्ष पद भी संभाला था। वे समाज समता संघ के स्थान पर ‘चातुर्यवर्ण विनाशक संघ’ बनाना चाहते थे।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं

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