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रे बालक, तेरा बस्ता

पीले कुर्ते और सफेद पायजामे में मौलाना एकदम कढ़ी-चावल नजर आ रहे थे। आते ही बोले- भाई मिया, मुबारक! अब जाकर बच्चें के बोझ का नाप-तौल शुरू हुआ है। आपको याद होगा कि हमारे आपके टाइम में, छोटी क्लासों में एक तख्ती, एक बुदक्का (दवात) और दो परांठों जैसी पतली-पतली किताबें काफी हुआ करै थीं। उन्हें ही पढ़कर जड़ मजबूत हुई। आप राइटर बने और मैं बहैसियत हेड पोस्ट मास्टर रिटायर हुआ। फिर जमाने ने तरक्की की, शिक्षा का विकास हुआ और बच्चों की पीठ टेढ़ी हो गई।

मुंह की लुगदी अलग जमा करके मौलाना बोले- ‘बखुदा भाई मियां, आज किसी बच्चे को स्कूल से लौटते पर पीठ पर बस्ता लादे, झुक कर चलते देखता हूं तो लगता है जैसे घर का गेहूं पिसाने ला रहा है। चार-चार मंजिल के स्कूल, पचासों सीढ़ियां.. लगता है मजदूर ईंटें ढो कर चौथी मंजिल पर ले जा रहा है। क्या पुख्ता और वजनी मौजूदा पढ़ाई इसे ही कहते हैं। हमने सेंठे की कलम से लिखा।

अब नर्सरी केजी से ही बालपेन चालू..राइटिंग माशा अल्ला। लगता है काक्रोच को रोशनाई में डुबा कर कागज पर छोड़ दिया गया हो। आज कुछ राहत मिली। न्यूज पढ़ी कि अब सेंट्रल स्कूलों में बच्चों के बस्ते तौले जाएंगे। क्लास एक और दो में दो किलो से ज्यादा नहीं। तीन और चार में तीन किलो। इसमें लंच बाक्स वाली ब्रेड या आलू के परांठे भी शामिल हैं।’ तभी सामने से मोहल्ले का एक बच्चा बस्ता लादे घर जाता नजर आया।

बस्ते का फूला हुआ पेट देखकर मौलाना बोले- ‘खुदा करे हर स्कूल वाले की आंखें रोशन हों और बच्चे को बच्चा समझें.. दिहाड़ी मजदूर नहीं।’ मौलाना ने लपक कर बच्चे का बस्ता पीठ से उठा लिया और घर तक पहुंचाने चले गए। बच्चे पर से बोझ हटने पर मुझे भी राहत हुई।

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