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आखिर प्रभाव ही तो है

एक छोटी सी कहानी है। एक पियक्कड़ शख्स थे। पीने के चक्कर में उन्होंने अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली। एक दिन वह असमय चल बसे। उनके दो बेटे थे। बड़ा बेटा बिल्कुल पिता की तरह निकला। दूसरा बिल्कुल उलट। दोनों के तर्क का केंद्र पिता ही थे। बड़े का कहना था कि उसके पिता पीते थे, इसलिए मैं भी पीता हूं। दूसरे का कहना था, उसके पिता पीते थे, इसलिए मैंने तय किया कि कभी नहीं पीऊंगा।

शिकागो यूनिवर्सिटी में प्राइमरी केयर के डायरेक्टर रहे डॉ. एलेक्स लिकरमेन मानते हैं कि यह हम पर निर्भर करता है कि प्रभाव को कैसे लेते हैं? उस प्रभाव को ग्रहण तो हमें ही करना होता है। बुरे प्रभाव को लेना आसान है। अच्छे को लेना थोड़ा मुश्किल, लेकिन सबसे मुश्किल होता है बुरे प्रभाव को अच्छे में बदलना। वह कहानी अच्छे और बुरे प्रभाव की मिसाल है।

प्रभाव तो एक ही है, लेकिन उसका असर बिल्कुल उलट है। एक ने सीधे तौर पर उस बुरे प्रभाव को ले लिया। दूसरे ने उस बुरे प्रभाव को अच्छे प्रभाव में बदल डाला। बुरे को अच्छे में बदलने के लिए हमें अपने भीतर की मजबूती चाहिए। उससे बाहर निकलने का संकल्प चाहिए। अगर हम भीतर से मजबूत नहीं हैं, तो प्रभाव ज्यों का त्यों हावी हो सकता है। अगर वह अच्छा प्रभाव हुआ, तब तो ठीक है। उसका कोई नुक्सान नहीं होगा। लेकिन अगर वह बुरा हुआ, तो आपकी जिंदगी को बर्बाद कर सकता है।

उससे निकलना सचमुच मुश्किल होता है। डॉ. लिकरमेन कहते हैं कि उसके लिए हमारे भीतर एक ठोस अच्छा प्रभाव हावी होना चाहिए। तभी हम बुरे प्रभाव को हटा पाएंगे। सो, किसी से प्रभावित होने से पहले अपने को जान लेना चाहिए। अपनी प्रकृति को देखते हुए किसी प्रभाव को लेना या छोड़ना चाहिए। आखिर उस प्रभाव के साथ आपको ही जीना होगा।

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