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शमशाद: चारों तरफ रौशनी की तरह बिखर जाने वाली आवाज़

शमशाद: चारों तरफ रौशनी की तरह बिखर जाने वाली आवाज़

'कजरा मोहब्बत वाला', 'मेरी नींदों में तुम', 'मेरे ख्वाबों में तुम', 'तेरी महफिल में किस्मत आज़मा कर', 'हम भी देखेंगे' और 'लेके पहला पहला प्यार' जैसे सदाबहार गीतों की फिल्में और संगीतकार भले ही अलग हैं, लेकिन इन सब में एक बात समान है कि इन सभी गीतों को शमशाद बेग़म ने अपनी खनकदार आवाज़ दी है।
    
अपनी पुरकशिश आवाज़ से हिंदी फिल्म संगीत की सुनहरी हस्ताक्षर शमशाद बेग़म के गानों में अल्हड़ झरने की लापरवाह रवानी, जीवन की सचाई जैसा खुरदरापन और बहुत दिन पहले चुभे किसी कांटे की रह रहकर उठने वाली टीस का सा एहसास समझ में आता है।

उनकी आवाज़ की यह अदाएं सुनने वालों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करती है और उनके गानों की लोकप्रियता का आलम यह है कि आज भी उन पर रीमिक्स बन रहे हैं। करीब चार दशकों तक हिन्दी फिल्मों में एक से बढ़कर एक लोकप्रिय गीतों को अपनी आवाज़ देने वाली शमशाद बेग़म बहुमुखी प्रतिभा की गायिका रहीं हैं। साफ उच्चारण, सुरों पर खरी पकड़ और अनगढ़ हीरे सी चारों तरफ रोशनी की तरह बिखर जाने वाली शमशाद की आवाज़ जैसे सुनने वाले को बांध ही लेती थी। उन्होंने फिल्मी गीतों के अलावा नात, भक्ति गीत, गज़ल आदि भी गाए।
   
गायकों और संगीतकारों पर अकसर यह आरोप लगाया जाता है कि वो संगीत के चक्कर में शब्दों को पीछे धकेल देते हैं या उच्चारण के मामले में समझौता करते हैं। लेकिन शमशाद बेग़म के गानों में यह तोहमत कभी नहीं लगाई जा सकी। उस दौर के बेहद मशहूर संगीतकार ओ पी नय्यर ने तो एक बार यहां तक कहा था कि शमशाद बेग़म की आवाज़ मंदिर की घंटी की तरह स्पष्ट और मधुर है।
    
सीआईडी फिल्म में लोकधुनों पर आधारित गीत 'बूझ मेरा क्या नाम रे' गाने वाली शमशाद ने संगीतकार सी रामचन्द्रन के लिए 'आना मेरी जान संडे के संडे' जैसा पश्चिमी धुनों पर आधारित गाना भी गाया, जो उनकी आवाज़ की विविधता की बानगी पेश करते हैं। इस गाने को हिन्दी फिल्मों में पश्चिमी धुनों पर बने शुरूआती गानों में शुमार किया जाता है।
   
समीक्षकों के अनुसार शमशाद बेग़म की आवाज़ में एक अलग ही वजन था, जो कई मायने में पुरूष गायकों तक पर भारी पड़ता थी। मिसाल के तौर पर रेशमी आवाज़ के धनी तलत महमूद के साथ गाए गए युगल गीतों पर स्पष्ट तौर पर शमशाद बेग़म की आवाज़ अधिक वज़नदार साबित होती है।
    
अमृतसर में 14 अप्रैल 1919 में जन्मी शमशाद बेग़म उस दौर के सुपर स्टार गायक कुंदनलाल सहगल की ज़बरदस्त फैन थी। एक साक्षात्कार में शमशाद बेग़म ने बताया कि उन्होंने के एल सहगल अभिनीत 'देवदास' फिल्म 14 बार देखी थी। उन्होंने सारंगी के उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब से संगीत की तालीम ली।
    
शमशाद बेगम ने अपने गायन की शुरूआत रेडियो से की। 1937 में उन्होंने लाहौर रेडियो पर पहला गीत पेश किया। उस दौर में उन्होंने पेशावर, लाहौर और दिल्ली रेडियो स्टेशन पर गाने गाए। शुरूआती दौर में लाहौर में निर्मित फिल्मों 'खजांची' और 'खानदान' में गाने गाए। वो 1944 में बंबई आ गईं थी।
    
मुंबई में शमशाद ने नौशाद अली, राम गांगुली, एस डी बर्मन, सी रामचन्द्रन, खेमचंद प्रकाश और ओ पी नय्यर जैसे तमाम संगीतकारों के लिए गाने गाए। इनमें भी नौशाद और नय्यर के साथ उनका तालमेल कुछ ख़ास रहा क्योंकि इन दोनों संगीतकारों ने शमशाद बेग़म की आवाज़ में जितनी भी विशिष्टताएं छिपी थी उनका भरपूर प्रयोग करते हुए एक से एक लोकप्रिय गीत दिए।
     
नौशाद के संगीत पर शमशाद बेग़म के जो गीत लोकप्रिय हुए उनमें 'ओ लागी लागी'- आन, 'धड़ककर मेरा दिल'- बाबुल, 'तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे'- मुग़ले आज़म और 'होली आई रे कन्हाई'- मदर इंडिया शामिल हैं।
     
लोकधुनों और पश्चिमी संगीत का अदभुत तालमेल करने वाले संगीतकार ओ पी नय्यर के संगीत निर्देशन में तो शमशाद बेग़म ने मानों अपने सातों सुरों के इंद्रधुनष का जादू बिखेर दिया है। इन गानों में 'लेके पहला पहला प्यार'-सीआईडी, 'कभी आर कभी पार' -आरपार, 'कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना' सीआईडी, 'कजरा मोहब्ब्त वाला' -किस्मत, 'मेरी नींदों में तुम मेरे ख्वाबो में तुम'- नया अंदाज़, ऐसे गीत हैं जो सुनने वाले को गुनगुनाने के लिए मजबूर कर देते हैं।
    
करीब तीन दशक तक हिन्दी फिल्मों में अपनी आवाज़ का जादू बिखरेने के बाद शमशाद बेगम ने धीरे धीरे गायन के क्षेत्र से अपने को दूर कर लिया। समय का पहिया घूमते घूमते अब रिमिक्सिंग के युग में आ गया है। आज के दौर में भी शमशाद के गीतों का जादू कम नहीं हुआ क्योंकि उनके कई गानों को आधुनिक गायकों और संगीतकारों ने रीमिक्स कर परोसा और नई बोतल में पुरानी शराब के सुरूर में नई पीढ़ी थिरकती नज़र आई।

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