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घुमक्कड़ी को साहित्य की ड्योढी तक पहुंचाया राहुल सांकृत्यायन ने

घुमक्कड़ी को साहित्य की ड्योढी तक पहुंचाया राहुल सांकृत्यायन ने

हिन्दी में करीब 150 ग्रन्थों की रचना करने वाले राहुल सांकृत्यायन को भले ही समीक्षक और आलोचक महापंडित की उपाधि से नवाजते हैं, लेकिन आम पाठकों की नजर में वह एक ऐसे रचानकार हैं, जिन्होंने घुमक्कड़ी से जुड़ी रचनाओं को साहित्य की ड्योढ़ी में प्रवेश दिलवाया।

राहुल सांकृत्यायन ने पूरे भारत के अलावा तिब्बत, सोवियत संघ, यूरोप और श्रीलंका की यात्राएं की। बाद में उन्होंने अपने अनुभवों पर 'घुमक्कड़ शास्त्र' की रचना की जो घुमक्कड़ों के लिए निर्देश पुस्तक से कम नहीं है। वह अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों और युवाओं को यात्रा नहीं वरन घुमक्कड़ी के लिए तरह-तरह से प्रेरित भी करते थे।

घुमक्कड़ी के बारे में सांकृत्यायन ने अपने एक निबंध में युवाओं को इसके लिए प्रेरित करते हुए इस शेर का उल्लेख किया था, सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहां।
आजमगढ़ के एक गांव में अप्रैल 1893 में पैदा हुए राहुल सांकृत्यायन ने विधिवत शिक्षा हासिल नहीं की थी और घुमक्कड़ी जीवन ही उनके लिए महाविद्यालय और विश्वविद्यालय थे।

अपनी विभिन्न यात्राओं के क्रम में वह तिब्बत भी गए थे। उन्होंने दुर्लभ बौद्ध साहित्य को एकत्र करने की दिशा में काफी काम किया। वह तिब्बत से बौद्ध धर्म की हस्तलिखित पोथियां खच्चरों पर लाद कर लाए थे और बाद में उनका यहां प्रकाशन भी करवाया था।


वरिष्ठ उपन्यासकार एवं कवि प्रकाश मनु के अनुसार राहुल सांकृत्यायन महापंडित थे, क्योंकि उन्होंने विविध विषयों और विधाओं में लिखा। लेकिन उनके यात्रा वृतांत और घुमक्कड़ी साहित्य ही आम लोगों के मानसपटल पर छाए हुए हैं।

मनु के अनुसार महापंडित होने के बावजूद राहुल सांकृत्यायन अपनी निजी जिंदगी में बेहद सरल एवं सहज व्यक्ति थे। उनका यह सहज व्यक्तित्व उन्हें यात्रा के दौरान विभिन्न लोगों से शीघ्र दोस्ती करने में मददगार साबित होता था।

उन्होंने कहा कि सांकृत्यायन को साहित्य के अलावा लोकजीवन पर भी गहरी पकड़ थी। लोकजीवन के बारे में उनकी यह समझ वोल्गा से गंगा तक सहित उनकी तमाम रचनाओं में मिलती है। मनु ने कहा कि सांकृत्यायन की तरह के एक अन्य साहित्यकार देवेन्द्र सत्यार्थी थे। सत्यार्थी ने भी सांकृत्यायन की तरह काफी घुमक्कड़ी की और लोकजीवन पर लिखा। सत्यार्थी ने सांकृत्यायन के साथ हुई अपनी मुलाकात का विस्तृत वर्णन लिखा है, जिसे पढ़ना अपने आप में एक दिलचस्प अनुभव होता है।

राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं का दायरा विशाल है। उन्होंने अपनी आत्मकथा के अलावा कई उपन्यास, कहानी संग्रह, जीवनी, यात्रा वृतांत लिखे हैं। इसके साथ ही उन्होंने धर्म एवं दर्शन पर कई किताबें लिखी। समीक्षकों का उनकी बहुचर्चित कृतियों में से एक 'वोल्गा से गंगा' के बारे में कहना है कि जिस शैली में यह पुस्तक लिखी गई है, हिंदी में कम ही पुस्तकें उस शैली में हैं।


प्रागैतिहासिक काल यानी पांच हजार से भी अधिक पुरानी सभ्यता से आधुनिक काल तक मानव की प्रगति का जिक्र करते हुए इस कृति की जो शैली है, वह काफी रोचक एवं सरस है। हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार भगवान सिंह के अनुसार राहुल सांकृत्यायन को इतिहास की विशेष समझ थी, हालांकि उन्होंने विधिवत शिक्षा हासिल नहीं की थी। इतिहास की समझ विकसित होने में उनके देशभ्रमण की अहम भूमिका थी।

राहुल सांकृत्यायन ने अपने जीवन में कई बार अपनी विचारधारा, वेषभूषा बदली। नैष्ठिक ब्राह्मण से लेकर बौद्ध भिक्षु, किसान नेता, संन्यासी, साम्यवादी बनकर उन्होंने जीवन के तमाम रंगों को करीब से देखा। लेकिन हर रंग में वह हिन्दी के प्रबल पक्षधर बने रहे। हिन्दी के इस महान रचनाकार की कई कृतियों का अंग्रेजी ही नहीं रूसी सहित तमाम भाषाओं में अनुवाद हुआ।

साहित्य सेवाओं के लिए उन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण से नवाजा। इससे पूर्व उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। भारतीय डाक विभाग ने उनकी याद में 1993 में एक रूपए मूल्य का स्मृति डाक टिकट जारी किया था। पटना के राजकीय संग्रहालय में हिन्दी के इस महान साहित्यकार की स्मृति में एक विशेष वीथिका भी बनाई गई है।

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