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दो टूक (मंगलवार, 13 अप्रैल 2010)

दिल्ली के कुख्यात ट्रैफिक के लिए उम्मीद की किरण जगी है। ट्रैफिक के तमाम पहलुओं को फिलहाल अलग-अलग एजेंसियां देखती हैं। सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो डूमटा के गठन के बाद राजधानी की ट्रैफिक व्यवस्था से जुड़ी दिक्कतों को दुरुस्त करने में दस ऑफिसों के अड़ंगे नहीं लगेंगे। योजनाओं को बनाने, उन्हें मंजूरी दिलाने और जमीन पर उतारने में कम समय लगेगा। इसी तरह नई जरूरतों के मुताबिक पुराने तौर-तरीकों को बदलने में भी आसानी होगी। कम से कम डूमटा का परिचय तो यही कहता है। दरअसल, सरकारी तंत्र में सबसे बड़ी चुनौती कर गुजरने की भावना पैदा करने की है। रवैया नहीं बदला तो कवायद नई बोतल में पुरानी शराब भरने से ज्यादा कुछ नहीं होगी।

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