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ऐसे तो बुझ गई जंगलों की आग

‘हम जंगलों को आग से बचाने के लिए बूट, पानी की बोतल और आग बुझाने के उपकरण मांग रहे हैं। वन विभाग में जब तक अफसरों का दबदबा रहेगा, न जंगल आग से बचेंगे, न वन तस्करों की नकेल कसेगी। सेमिनार और गोष्ठियों से आग नहीं बुझती। सच्चई यह हमें आज भी झाड़ियों आग बुझानी पड़ रही है।

अफसरों की तनख्वाह 40 हजार से लेकर डेढ़ लाख तक है। तीन-तीन पीसीसीएफ और दजर्न भर से ज्यादा सीसीएफ विभाग में हैं, जबकि एक पीसीसीएफ के बदले 15 वन रक्षक रखे जा सकते हैं।’ उत्तराखंड वन रक्षक संघ के प्रदेश महामंत्री ऋषिराम पैन्यूली का यह बयान वन महकमे के अंदरूनी सच्चई बयां करता है। उनका यह कहना सौ फीसदी सच है कि, वन कर्मचारी जंगलों की आग से झाड़ियों के सहारे ही जूझ रहे हैं।

विभाग के कर्मचारियों के पास आग से लड़ने को कोई आधुनिक यंत्र नहीं है। पहले कर्मचारी आग बुझाने को झाड़ियों का झाडू प्रयोग करते थे वर्तमान में उन्हें तार के बने झाड़ू उपलब्ध कराए गए हैं। कर्मचारियों को दी गई किट में एक तार का बना झाड़ू, फावड़ा, बेलचा, रैक, वाटर बोतल व टार्च के सिवा कुछ नहीं होता है। इनमें से कई यंत्रों का भार अधिक होने के कारण कर्मचारी उन्हें साथ ले जाना उचित नहीं समझते।

मजदूरी देने को पैसे नहीं
मुख्य वन संरक्षक दावाग्नि एसके सामंत का कहना है कि, राज्य में कुल 1133 क्रू स्टेशन बनाए हैं। इनमें कुमाऊं में 477 और गढ़वाल मंडल में 494 क्रू स्टेशन बनाए गए हैं। वाइल्ड लाइफ क्षेत्रों के लिए अलग से 162 क्रू स्टेशनों का निर्माण किया गया है। हर क्रू स्टेशन में कम से कम 10 लोगों का स्टाफ अनिवार्य है पर इन क्रू स्टेशनों की हालत यह है कि इनमें दो आदमी भी नहीं है।

 सामंत का कहना है कि सरकार ने इस वित्तीय वर्ष में दावाग्नि की मद में धेला भी नहीं दिया है। डीएफओ एके बनर्जी का कहना है कि हर श्रमिक को दावाग्नि बुझाने के लिए रोजाना कम से कम 100 रुपये की मजदूरी देनी पड़ती है। हमारे पास धेला नहीं है। मजदूर कहां से लाएं।

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