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दिलों की आग, दहशत के आतिशखाने

पिछले महीने मॉस्को में सबवे पर हुए आत्मघाती हमले का नेतृत्व मासूम चेहरे वाली 17 साल की एक लड़की ने किया। दागिस्तान के मुस्लिम बहुल इलाके की इस लड़की का पति पिछले दिसम्बर में रूसी फौजों के हाथों मारा गया था। आत्मघाती हमलों को अंजाम देने वालों में और उसमें मरने वालों में अक्सर महिलाएं और बच्चों होते हैं। मरने और मारने वालों का कोई सीधा बैर नहीं होता। कोई अपनी जान देकर किसी काम को किस अंजाम तक पहुँचाना चाहता है और क्यों? अजमल कसाब क्या जानता है कश्मीर आंदोलन के बारे में, जिसके लिए उसने इतनी जानें लीं? या नलिनी को राजीव गांधी से क्या शिकायत थी? दंतेवाड़ा में नक्सलयों ने सीआरपी के जवानों की हत्या की और अब कह रहे हैं कि हम उनके परिवारों की आर्थिक सहायता करेंगे।

कोमल या भ्रमित मन जल्द उत्तेजित हो जाते हैं। दूसरी ओर आतंकवाद की राजनैतिक लड़ाई चलाने वालों को एक फिदायी के मरने पर चार और की भर्ती का भरोसा है। 17 बरस की जेनेत अब्दुख्र्मानोवा का पति उमलात मेगोमेदोव उत्तरी कॉकेशस के दागिस्तान में चल रहे इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन में शामिल था। मॉस्को बम कांड होते ही जेनेत और उसके पति की हाथों में पिस्तौलें लिए तस्वीर अखबारों के पास कहाँ से आ गई? किसी ने इस तस्वीर को पहले से प्रचार के लिए तैयार कर रखा था। रूस के जेहादी इन दिनों विधवाओं का इस्तेमाल फिदायी बमबारों के रूप में कर रहे हैं। इसके दो फायदे हैं। एक, अपने समर्थकों की भावनाओं को जगाए रखना। फिर सुरक्षा घेरा भेदने में महिलाओं को आसानी होती है। रूस के फिदायी हमलों में पचास प्रतिशत से ज्यादा यही ब्लैक विडोज़ होती हैं। दहशत के संचालकों और काउंटर-टैररिस्ट मैनेजरों को जीवन से हारे, निराश और बदला लेने पर उतारू लोगों की ज़रूरत है। आखिरकर आतंकवाद मानसिक युद्ध है। किसी को उकसाना, किसी को डराना और किसी ऐसे की आड़ लेना जिसके बारे में सोचा न गया हो।                               

पिछले साल रिचर्ड हेडली की गिरफ्तारी के बाद एक नया ट्रेंड सामने आया है। एक के बाद एक कई अमेरिकी नागरिक आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में पकड़े गए हैं। रिचर्ड हेडली मूल रूप से पाकिस्तान से जुड़ा था, पर उसका नाम और देश उसे संदेह के घेरे से बचाता था। इधर 9 मार्च 2010 को अचानक कॉलीन लारोज़ नाम की एक महिला का नाम सामने आया, जिस पर भारत में अभी ज्यादा चर्चा नहीं हुई है। रिचर्ड हेडली आंशिक रूप से पाकिस्तानी है। पर कॉलीन, जिसने खुद को जेहाद जेन नाम भी दिया है, शत-प्रतिशत फिंरंगी है। उसे रिचर्ड हेडली की गिरफ्तारी के एक पखवाड़े बाद ही अक्टूबर 2009 में गिरफ्तार किया गया था। उसके साथ आयरलैंड में सात लोग और पकड़े गए। इन सात में से चार बाद में छूट गए। बाकी बचे तीन लोगों में जैमी पॉलीन रैमिरेज़ नाम की एक और अमेरिकी महिला है।

अक्सर अनेक रहस्य कभी नहीं खुलते। इस मामले की हवा किसी को नहीं लगी थी। तफतीश को आगे बढ़ाने के लिए इसे प्रचारित नहीं किया गया। अदालत में आने के बाद यह मसला सामने आया है। यह मुकदमा अब तीन मई से शुरू होगा। कौन जाने हमारी दिलचस्पी की कुछ बातें सामने आएं। डेविड कोलमैन हेडली के मामले में भारतीय जाँच दल को अभी तक पूछताछ की अनुमति नहीं मिली है। ऐसा लगता है कि हेडली अमेरिका और लश्करे तैयबा का डबल क्रॉस था। आतंकी गतिविधियों में पाकिस्तानी सेना का हाथ होने के सबूत ज़रूर हेडली के पास होंगे। पिछले साल सितम्बर में माइकल फ्लिंटन नाम का एक और अमेरिकन पकड़ा गया था। वह भी धर्मातरण करके मुसलमान बना था। वह अपने जिस साथी को अल क़ायदा का सदस्य मानकर चल रहा था वह एफबीआई का एजेंट था। यह गिरफ्तारी भी हेडली की गिरफ्तारी के आसपास हुई। हाल में अफीफा सिद्दीकी नाम की एक और लड़की पकड़ी गई है। पश्चिमी नाम वाले गोरों और महिलाओं का इस्तेमाल इधर आतंकी गतिविधियों में बढ़ा है।

रिचर्ड हेडली डेनिश काटरूनिस्ट की तलाश में था। कॉलीन लारोज़ उर्फ फातिमा रोज़ एक स्वीडिश आर्टिस्ट की तलाश में थी, जिसने मुसलमानों को आहत करने वाला चित्र बनाया था। कॉलीन के जीवन की कहानी पढ़ें तो पता लगता है कि वह हाईस्कूल तक भी नहीं पढ़ पाई। छुटपन में शादी हुई, टूट गई। फिर किसी के साथ रहने लगी। इस दौरान इस्लाम धर्म कबूल कर लिया। भाई और पिता की मौत के कारण परेशान थी। उसकी निजी परेशानियों के साथ इस्लामी संवेदना ने उसके मन में किस तरह प्रवेश किया, इसकी खोज कौन करेगा? धर्मातरण के बाद उसकी परेशानियों ने उसे इस्लाम का अपमान करने वालों के खिलाफ खड़ा कर दिया। ‘माय स्पेस’ और ‘यू ट्यूब’ में कॉलीन की टिप्पणियों से लगता है कि पश्चिम एशिया की खूंरेज़ी से वह परेशान थी। उसने लिखा-‘आई सपोर्ट ऑल द मुजाहिदीन। आई हेट ज़ियनिस्ट्स।’ कौन जाने उसकी कहानी सही है या वह भी डबल क्रॉस है। 
माता-पिता, भाई या पति की मौत ट्रिगर का काम करती है, खासकर नाइंसाफी। संवेदनहीनता का बढ़ना और अन्याय को महसूस करना व्यक्ति को दहशतगर्दी की ओर ले जाता है। हर कोई जानना चाहता है कि अमेरिका या पश्चिम के प्रति मुसलमानों के मन में नाराज़गी क्यों है? अमेरिका की पत्रिका ‘फॉरेन पॉलिसी’ के नवम्बर 2006 के अंक में प्रकाशित एक सर्वेक्षण रपट से पता लगता है कि हम जिन्हें कट्टरपंथी समझते हैं, वे नरमपंथियों की तुलना में कम धार्मिक और आर्थिक रूप से सबल होते हैं। अमेरिका के लोग समझते हैं कि धार्मिक कट्टरपंथी, हमारे लोकतंत्र, हमारे खुलेपन और हमारे रहन-सहन से चिढ़ते हैं। पर औसत मुसलमान पश्चिम के लोकतंत्र, आज़ादी और फ्रीडम ऑफ स्पीच की आलोचना नहीं करता। बल्कि सराहना करता है। तमाम मुसलमान अमेरिका में रहना चाहते हैं। पर यह भी चाहते हैं कि पश्चिम हमारे मज़हब का सम्मान करना सीखे, हमारे साथ भेदभाव न करे।
कहा जाता है अल क़ायदा जैसा कोई विशाल गिरोह वास्तव में है नहीं। वह वर्च्युल है। इंटरनेट के सहारे चलता है। इंटरनेट के सहारे पकड़ा भी जाता है। ब्लॉग्स और वेबसाइट्स की खुली टिप्पणियों, वीडियो-ऑडियो क्लिप्स, फोटो और इसी तरह की तमाम चीज़ों ने मामले को ठीक करने के बजाय और कड़वा बना डाला है। मरहम कम हैं, नासूर ज्यादा। हम विचित्र दौर में हैं। एक ओर सूचनाओं के परनाले हैं और दूसरी ओर रहस्य के अंधे कुएँ। सब पर हावी हैं कुछ खुशफहमियाँ और कुछ गलतफहमियाँ।
pjoshi23@gmail.com
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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