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खाने पर जरा सोचिए

हर रोज अपनी भागमभाग की जिंदगी में हम क्या-क्या नहीं खाते? हमें जो भी भागते-दौड़ते मिल जाता है, खा लेते हैं। सुबह यही होता है। शाम यही होता है। रात में भी थक-हार कर कुछ भी खा कर सो जाते हैं। हम क्या खा रहे हैं? उस पर सोचने का तो हमारे पास वक्त ही नहीं होता।
जैसा खाना वैसी सोच। कहा जाता है कि हम जो खाते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। वेलनेस एक्सपर्ट आर्थर गाजारिएंट्स मानते हैं कि हम जो महसूस करते हैं या जो सोचते हैं, उसका भी हमारे खाने से एक रिश्ता है। अपने यहां कहावत है, जैसा अन्न वैसा मन। हमारे ऋषि-मुनि तो मानते रहे हैं कि सात्विक खाने से हम सात्विक होते हैं। और तामसिक खाने से तामसिक हो जाते हैं। इसीलिए खाने पर बहुत जोर अपने यहां दिया गया है। व्रत पर भी इतना जोर इसी समाज ने दिया है। व्रत का मतलब है कि हम सात्विक खाएंगे। सात्विक ही सोचेंगे। यानी खाना और सोचना दोनों को वे एक ही प्रक्रिया का अंग मानते हैं। संत है तो सात्विक खाना ही खाएगा। यह हमारे यहां सहज धारणा है।
सादा खाने पर इतना जोर शायद ही दुनिया में कहीं दिया गया हो। एक कहावत ही बन गई सादा जीवन उच्च विचार। उस सादा जीवन में सादा खाने पर ही सबसे ज्यादा जोर है। अपने यहां ही नहीं पश्चिमी समाज भी सादा खाने की बात करता रहा है। हमारे शरीर को संतुलित खाना चाहिए। यानी प्रोटीन, वसा, काबरेहाइड्रेट वगैरह का ठीक से खयाल। उससे हमारा मेटाबॉलिज्म ठीक होता है। वही हमारे दिल और दिमाग को दुरुस्त रखता है। हमारे सोचने और महसूस करने के लिए वह बेहतर माहौल बनाता है। अब जिस तरह का संतुलित या असंतुलित खाना हम खाते हैं, उसी अंदाज में हमारा सोचना या महसूस करना होता है। तो खाने से पहले जरा सोचिए।

 

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  • Web Title:खाने पर जरा सोचिए