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परमाणु आतंकवाद

आज यह आशंका दुनिया को थर्रा देती है कि कहीं न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमला करने वाले आतंकियों के पास परमाणु हथियार होता तो क्या स्थिति होती। इसी तरह की आशंका 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए हमले के बारे में भी व्यक्त की जाती है। दुनिया में नाभिकीय सामग्री चोरी करने के प्रयास और अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों के इरादे जैसे-जैसे जाहिर होते जा रहे हैं वैसे-वैसे ये आशंकाएं वास्तविक लगने लगी हैं। इन्हीं आशंकाओं से बेचैन दुनिया के 47 देश दो दिन तक सुरक्षा उपायों पर चर्चा करने में जुटे हैं। सम्मेलन का उद्देश्य परमाणु हथियार संपन्न देशों को नाभिकीय गठरी को चोरों से बचाने के लिए जगाना और उसे किसी लॉकर में बंद करने के लिए तैयार करना है। सन् 2005 में संयुक्त राष्ट्र ने इस बारे में एक संधि की थी। उसके बाद सन् 2006 और 2007 में अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को इस तरह की सामग्री हासिल करने की फिराक में लगे लोगों की जानकारियां मिली हैं। इसी सिलसिले में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पिछले साल प्राग में की गई उस अपील को देखा जा सकता है जिसमें उन्होंने नाभिकीय सामग्री की कालाबाजारी और उसके परिवहन के दौरान चुराए जाने के खतरे के प्रति आगाह किया था। नाभिकीय आतंकवाद के खतरों में नाभिकीय प्रसार के अलावा नाभिकीय रिएक्टरों पर हमला, बम बनाने वाली सामग्री हासिल करना या बना बनाया बम चुरा लिया जाना शामिल है। परमाणु बम में इस्तेमाल होने वाले उच्च परिवर्धित यूरेनियम का 95 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका और रूस के पास है। उसके बाद यह सामग्री उन बाकी देशों के पास है जिन्हें परमाणु हथियार संपन्न देश माना जाता है। फिर यह सामग्री उन देशों में हो सकती है जहां सारे प्रतिबंधों को दरकिनार कर परमाणु बम बनाने का प्रयास चल रहा है। उसके बाद उन देशों का नंबर आता है जहां यूरेनियम है और परिवर्धित सामग्री भी हो सकती है, पर उन देशों का संकल्प यह है कि वे परमाणु बम कभी नहीं बनाएंगे। आज की चुनौती न सिर्फ उस संवर्धित सामग्री को गलत हाथों में पड़ने से रोकना है बल्कि उस सामग्री को संभाल कर रखना है जो हथियारों की कटौती या उसे नष्ट किए जाने की स्थिति में बचेगी। आज दुनिया में 1670 टन उच्च संवर्धित यूरेनियम और 500 टन प्लूटोनियम है। इनमें से महज पांच किलो प्लूटोनियम या 25-40 किलो यूरेनियम उस तरह का बम बनाने के लिए काफी होगा जो नागासाकी हिरोशिमा पर गिराया गया था। यह आशंका अमेरिका और यूरोप ही नहीं भारत को भी काफी परेशान किए हुए है।
अमेरिका को अगर आतंकी संगठनों की घुसपैठ से खतरा है तो भारत को अपने भीतर और बाहर दोनों तरफ से खतरा है। भारत के पड़ोस में रखे पाकिस्तान के नाभिकीय जखीरे को अगर सुरक्षित नहीं किया गया तो वहां जड़ें जमाए आतंकवादी संगठन कभी ऐसा कारनामा कर सकते हैं जिससे दुनिया दहल जाए। इस लिहाज से नागरिक परमाणु करार के जरिए करीब आए भारत और अमेरिका परमाणु आतंकवाद रोकने के लिए ठोस कदम उठा सकते हैं। इस मुद्दे पर भारत और अमेरिका की साझेदारी न सिर्फ परमाणु आतंकवाद के खतरे को कम करने की व्यवस्था बनाने में कारगर हो सकती है बल्कि निरस्त्रीकरण और अप्रसार के दूरगामी उद्देश्य को भी पूरा कर सकती है।

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  • Web Title:परमाणु आतंकवाद