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जीएसएलवी

इस माह की पंद्रह तारीख को भारत पहली बार जीएसएलवी यानी जियोसिंक्रोनस सेटेलाइट लांच व्हीकल की मदद से अपना पहला सेटेलाइट छोड़ने जा रहा है जिसके बाद तीन अन्य सेटेलाइट भी छोड़े जाएंगे। एक लांच व्हीकल सेटेलाइट को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने में मदद करता है। गत कुछ वर्षो से पीएसएलवी (पोलर सेटेलाइट लांच व्हीकल) के बाद भारत ने उपग्रह भेजने में काफी सफलता प्राप्त की थी।
जियोसिंक्रोनस लांच व्हीकल अपने डिजाइन और सुविधाओं में पीएसएलवी से बेहतर होता है। यह तीन श्रेणी वाला लांच व्हीकल होता है जिसमें पहला सॉलिड आधार या पुश वाला, दूसरा लिक्विड प्रापेल्ड या तरल दबाव वाला तथा तीसरा क्रायोजेनिक आधारित होता है। पहली और दूसरी श्रेणी पीएसएलवी से ली गई है। शुरुआती जीएसएलवी व्हीकल्स में रूस निर्मित क्रायोजेनिक तृतीय स्टेज का इस्तेमाल हो रहा था। अब इसरो ने स्वदेश तकनीक से निर्मित क्रायोजेनिक इंजन का आविष्कार किया है।
जीएसएलवी की मदद से पांच हजार किलोग्राम का सेटेलाइट पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया जा सकता है। जियोसिंक्रोनस या जियोस्टेशनरी उपग्रह वह होते हैं जो पृथ्वी की भूमध्य रेखा के समक्ष स्थित होते हैं और वह पृथ्वी की गति के हिसाब से ही उसके साथ-साथ घूमते हैं। इस तरह जहां एक ओर पोलर सेटेलाइट पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है, वहीं जियोस्टेशनरी उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में एक ही स्थान पर स्थित रहता है। यह कक्षा पृथ्वी की सतह से 35,786 किलोमीटर ऊपर होती है।
इस लांच के बाद इसरो इनसेट 4 क्लास के भारी सेटेलाइट पृथ्वी की कक्षा में भेजने में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा। इसरो के सेटेलाइट कृषि, जलस्नोतों, शहरी विकास, पर्यावरण, वन, खनिज और महासागरों के संबंध में शोध कार्य करते हैं। अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में वर्षो से कार्यरत इसरो 1999 से सेटेलाइट लांचिंग का कार्य कर रहा है।

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