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पूरा हो पाएगा मायावती का सपना?

दिल्ली की गद्दी की लड़ाई में प्रधानमंत्री पद के जितने दावेदार उत्तर प्रदेश में हैं उतने किसी और राज्य में नहीं। इसलिए यूपी की चुनावी लड़ाई पर पूरे देश की निगाह होगी। दिल्ली की सरकार बनाने की दोनों अहम दावेदार पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के लिए यूपी में बढ़त के भारी मायने हैं। वहीं चुनाव बाद किंग मेकर के रोल में आने वाली सपा और बसपा के लिए यूपी को अपना मजबूत मोर्चा बनाए रखना जरूरी है। सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी ने यूपी में बहुमत की सरकार बनाने के साथ ही ऐलान कर दिया था कि उसका अगला लक्ष्य दिल्ली की सत्ता पर कब्जा करने का है। लिहाजा बसपा प्रमुख मायावती को सीएम से पीएम बनाने के लिए पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी है। ब्राह्मण, मुस्लिम समेत सभी जातियों को बसपा के बैनर तले गोलबंद करने के लिए लोकसभा क्षेत्रवार सम्मेलन हो रहे हैं। बसपा ने ज्यादातर प्रत्याशी साल भर पहले ही तय कर दिए थे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी के युवा महासचिव राहुल गांधी इसी प्रदेश से चुनाव लड़ते हैं। कांग्रेस के लिए यूपी बड़ी चुनौती है क्योंकि दिल्ली में दोबारा उसकी सरकार बनेगी या नहीं इसमें इस सूबे की अहम भूमिका होगी। केन्द्र में सरकार होने के बावजूद गए पांच साल में कांग्रेस ने यूपी में कोई ताकत नहीं बढ़ाई। पिछले विधानसभा चुनाव नतीजों ने यही साफ किया। ताकत बढ़ाने के लिए कांग्रेस को समाजवादी पार्टी का साथ चाहिए। वहीं सपा को भी बसपा के बढ़ते असर की काट के लिए कांग्रेस का साथ चाहिए। तालमेल की बात चल रही है। इसकी अंतिम तस्वीर ही तय करगी कि इसमें कितना दम होगा। तालमेल की ललक के पीछे दोनों दलों की कवायद की एक बड़ी वजह मुस्लिम वोटबैंक को अपने पाले में समेटने की कोशिश है। दरअसल यूपी में मुस्लिम वोट बैंक शुरू से बड़ा फैक्टर रहा है। करीब एक दर्जन सीटों पर यह निर्णायक भूमिका अदा करता है। लिहाजा इसे हासिल करने के लिए खासी राजनीतिक मार-काट मचती है। इस बार यह वोट इसलिए कुछ ज्यादा अहम हो गया है क्योंकि कल्याण सिंह के सपा के पाले में खड़े हो जाने से समीकरण बदलते लग रहे हैं। सपा और कांग्रेस की दोस्ती हुई तो कल्याण फैक्टर की पृष्ठभूमि में मुस्लिम वोट बैंक को दोनों दल कैसे रिझाएंगे यह देखने की बात होगी। वहीं बसपा इस विरोधाभास का राजनीतिक लाभ लेने की कोई कसर नहीं छोड़ रही। यूपी की इस लड़ाई में खुद को मजबूत कोण के रूप में स्थापित करने की चुनौती भाजपा के सामने भी है। उसके लिए यूपी की अहमियत इसलिए है कि कांग्रेस को हटा दिल्ली पर कब्जा करना है तो यूपी में प्रदर्शन अच्छा करना होगा। पिछला बार पार्टी को केवल दस सीटें मिली थीं। इस बार राष्ट्रीय लोकदल के साथ तालमेल कर पार्टी जातीय-क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की फिराक में है। पूरी संभावना है कि भाजपा को यह चुनाव पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बिना लड़ना होगा। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह खुद गाजियाबाद सीट से चुनाव लड़ेंगे, लिहाजा उनके गृह राज्य में पार्टी की प्रतिष्ठा दांव पर लगना स्वाभाविक है। भाजपा के राम मन्दिर राग की असली परीक्षा भी यूपी में ही होगी।

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