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फिक्र तो प्रैक्िटस घटने की है

सीआरपीसी में किए गए संशोधन से पुलिस की पावर कम नहीं हुई है बल्कि जनता को कुछ सेफगार्ड दिए गए हैं। यदि जनता को गिरफ्तारी से कुछ सुरक्षा दी गई है तो इसमें वकीलों को किस बात की परशानी है? लेकिन समस्या यह है कि इस संशोधन से वकीलों की प्रेक्िटस पर व्यापक असर पड़ेगा, जमानत के 80 फीसदी मामले समाप्त हो जाएंगे। यही वजह है कि वकील इस संशोधन को न्याय पालिका के अधिकार कम करने वाला और अपराधियों को छूट देने की कहानी गढ़ कर हड़ताल पर आमादा है। यह तो वही बात हो गई कि डाक्टर शहर में साफ पानी की सप्लाई होने के कारण हड़ताल पर चले जाएं और कहें कि साफ पानी से उनकी प्रेक्िटस कम हो जाएगी। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज आरएस सोढ़ी कहते हैं कि यह हड़ताल बकवास है। वकालत एक व्यावसाय है जिसे हड़ताल पर जाने का अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा भी है कि वकील हड़ताल पर नहीं जा सकते। संशोधन जनता के पक्ष में किया गया है। इससे वकीलों का क्या लेना देना? जेलें पहले से ही फुल हैं। अनावश्यक गिरफ्तारी को रोकने के लिए ही यह उपाय किया गया है। उन्होंने कहा कि सभी जानते हैं हड़ताल का मकसद क्या है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष व जाने माने आपराधिक अधिवक्ता अशोक अरोड़ा कहते हैं कि संशोधन में कुछ भी नया नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय वकीलों ने प्रेक्िटस इसलिए छोड़ दी थी और हड़ताल पर चले गए थे कि लोगों को अनावश्यक रूप से जेलों में ठूंसा जा रहा था लेकिन अब वकील हड़ताल पर इसलिए हैं कि लोगों जेलों में डालने के बजाए छोड़ा जा रहा है। मुवक्िकल से पैसा लेकर आप हड़ताल पर कैसे बैठ सकते हैं? यह पाप है। हड़ताल पर सुप्रीम कोर्ट बार एसेासिएशन के अध्यक्ष पीएच पारिख ने कहा कि सरकार को संशोधन करने से पहले बार से परामर्श लेना चाहिए था। संशोधन से न्याय पालिका के अधिकार कम हो गए हैं। क्या इससे कोर्टों में केसों के निपटार पर फर्क नहीं पड़ेगा? इस सवाल पर पारिख ने कहा कि वकील कोर्ट की प्रक्रिया को बाधित नहीं कर रहे हैं।

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