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ये मुश्किल राहें हैं या..

खाने में अपनी पसंदीदा कोई खास चीज छोड़ना। अपनी आदत में कोई बदलाव करना। लंबे वक्त तक काम करना। वजन कम करना। सुबह-सुबह दौड़ना या पढ़ना। इसी तरह के किसी हालात से जब हम गुजरते हैं, तो क्या कहने लगते हैं? ‘यह मुझसे नहीं होगा। यह तो बड़ा भारी काम है।’ बड़ा भारी यानी मुश्किल काम।
‘हर काम मुश्किल है। तब तक मुश्किल है, जब तक वह हो नहीं जाता। वह तब तक मुश्किल है, जब तक वह मुश्किल नहीं रह जाता।’ डॉ. सू मॉर्टर कहती हैं। वह कमाल की मोटीवेटर हैं। उन्होंने न जाने कितने लोगों से मुश्किल काम करा लिए हैं। दरअसल, सबसे मुश्किल होता है, हमारा बदलना। हम अपनी छोटी-छोटी आदतों को भी नहीं बदल पाते। एक आदत बदलने की जब हम सोचते हैं, तो कितना आसान लगता है। अरे भाई, एक ही आदत तो बदलनी है। लेकिन वह छोटी सी आदत हमारे पसीने छुड़ा देती है। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ याद आते हैं। वह सिगरेट छोड़ना चाहते थे, लेकिन नहीं छोड़ पाए। बाद में उनकी ट्रेजेडी ही कॉमेडी हो गई। उन्होंने गजब की बात कही। ‘सिगरेट छोड़ने में क्या है? सैकड़ों बार तो मैं ही छोड़ चुका हूं।’ अमेरिका के वेलनेस एक्सपर्ट स्कॉट जी मारकस मानते हैं कि कोई चीज मुश्किल है या नहीं। वह हमारी इच्छाशक्ति से जुड़ा होता है। हमारी इच्छाएं और उन्हें पाने के हमारे संकल्प तय करते हैं कि वह कितनी मुश्किल है। हमारा संकल्प जितना ठोस होता है, उतना ही मुश्किल रास्ता आसान होने लगता है। अगर मुश्किल राह पर चलने की कोशिश हमारे पुरखों ने न की होती, तो दुनिया इतनी आगे नहीं बढ़ गई होती। यह तो पहेली की तरह है। हर पहेली कितनी मुश्किल होती है, लेकिन जब सुलझ जाती है, तो उससे आसान कुछ भी नहीं होता। यही पहेली की खूबसूरती है।

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