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राष्ट्रवाद का उभार

राष्ट्रपति के चुनाव में जब महिंदा राजपक्षे जीते थे तब लोग मानते थे कि यह सिंहली राष्ट्रवाद के उभार की जीत है। लिट्टे से हुए युद्ध में यह उभार देखने को मिला था। और उसके बाद से यह उभार थमने का नाम नहीं ले रहा। युद्ध लोगों को जोड़ने का काम भी करता है। राष्ट्रवाद का जब उभार होता है तो लोग किसी भी कीमत पर देश को तोड़ना नहीं चाहते। उन्हें जहां कहीं भी उसे तोड़ने की आशंका होती है, तो वे उसे बर्दाश्त नहीं कर पाते। अब संसदीय चुनावों में भी महिंदा की ही पार्टी का बोलबाला रहा है। राष्ट्रपति और अब संसदीय चुनावों की जीत से सत्ताधारी पार्टी का आधार जबर्दस्त मजबूत हुआ है। ऐसा महसूस होता है कि जनता राजपक्षे को पूरे अधिकार दे। कुछ लोगों का कहना है कि ये चुनाव यथास्थितिवाद की ओर इशारा करते हैं, लेकिन अगर बहुमत यथास्थितिवाद को चाहता है, तो उसका भी सम्मान किया जाना चाहिए। श्रीलंका की जनता को अगर राजपक्षे में इतना भरोसा है, तो अब उम्मीदों पर उतरने की बारी उनकी है।
डेली मिरर, श्रीलंका

गलत वजहों से याद न किया जाए
नई संसद की तैयारियां शुरू हो गई हैं। आखिर पिछली संसद को कैसे याद किया जाएगा? घोटालों वाली सड़ी हुई संसद। अगली संसद का हमें इंतजार है। उसे उन सब चीजों को साफ-सुथरा बनाना होगा जिसकी वजह से पिछली संसद इतनी बदनाम हुई। संसद और सांसदों की गरिमा को फिर से स्थापित करना उसका असल मकसद होना चाहिए। लेबर पार्टी ने आखिरी सालों में बेहद निराश किया है, लेकिन कंजरवेटिव पार्टी ने भी तो विपक्ष की भूमिका को ठीक से नहीं निभाया है। फिर भी उम्मीद करनी चाहिए कि अगली संसद बेहतर काम करेगी। उसे कम से कम गलत वजहों से याद नहीं किया जाना चाहिए।
डेली टेलीग्राफ, ब्रिटेन

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