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रेडिएशन के खतरों से चाहिए पुख्ता सुरक्षा तंत्र

दिल्ली में हालिया कोबाल्ट-60 विकिरण दुर्घटना से रेडियोधर्मी तत्वों के खतरे की आहट एक बार फिर जन-साधारण और प्रशासन को चौंका गई है। यह हादसा बेशक एक दुर्घटना थी, लेकिन इससे रेडियोधर्मी तत्वों से फैलने वाले विकिरण के दूरगामी परिणामों पर एक बार फिर सोचना जरूरी हो जाता है। रेडियोधर्मिता न केवल बीमारी फैलाती है बल्कि कई मामलों में इसका असर भावी पीढ़ियों पर भी पड़ता है जिसके सबसे बड़े प्रमाण के रूप में भोपाल गैस त्रासदी को जब-तब याद किया जाता है। जरूरत है देश को विषाक्त औद्योगिक कचरे से बचाने की जिसकी ऐसे विकिरण फैलाने के संबंध में बहुत बड़ी भूमिका रहती है। यहां प्रस्तुत है इस हादसे के कारण और विकिरण से फैलने वाली बीमारियों की जानकारी देता अनुराग मिश्र का यह आलेख

कुछ दिन पूर्व दिल्ली के मायापुरी के कबाड़ बाजार में आइसोटोप (समस्थानिक) कोबाल्ट-60 के विकिरण होने से मचा हड़कंप जारी है। भारत में रेडिएशन फैलने की इस घटना ने सरकार सहित सभी को सकते में डाल दिया था।
घटना
इस 12 मार्च को दिल्ली की मायापुरी क्षेत्र के एक स्क्रैप डीलर दीपक जैन ने फरीदाबाद से वेस्ट पदार्थ खरीदा था। उनके एक कर्मचारी राजिंदर प्रसाद द्वारा इस स्क्रैप के कंटेनर को खोलते ही रेडियोएक्टिव कोबाल्ट-60 सक्रिय हो गया। जैन और उनके चार कर्मचारी इसके प्रभाव में आ गए और अस्पताल में अपनी जिंदगी बचाने को संघर्ष कर रहे हैं।
क्या है कोबाल्ट-60
यहां पहले जानने की जरूरत है कि कोबाल्ट-60 क्या है। 1938 में जॉन लिविंगगुड और ग्लेन सीबोर्ग ने कोबाल्ट-60 की खोज की थी। कोबाल्ट शब्द जर्मन शब्द ‘कोबोल्ड’ से बना है जिसका अर्थ होता है गोबलिन। इस शब्द का प्रयोग खदान में काम करने वाले कोबाल्ट के अयस्क के लिए इस्तेमाल करते हैं। कोबाल्ट-60 धातु का एक रेडियोएक्टिव आइसोटोप यानी समस्थानिक है। यह मेटल रेडिएशन के तौर पर गामा किरणें लगातार छोड़ता रहता है। इसलिए रेडियोथेरेपी के जरिए कैंसर के इलाज में इस मेटल का प्रयोग किया जाता है। इस मेटल का आधा जीवनकाल साढ़े पांच साल का होता है यानी साढ़े पांच साल में ये इतना रेडिएशन छोड़ता है कि इसकी मात्रा आधी रह जाती है। इसकी आयु कम होने के कारण कोबाल्ट-60 को प्राप्त करने का कोई प्राकृतिक स्त्रोत नहीं है। कृत्रिम कोबाल्ट-60 को कोबाल्ट-59 पर प्रयोगशाला में न्यूट्रॉनों की बौछार करके बनाया जाता है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो कोबाल्ट यौगिक का प्रयोग सदियों से किया जाता रहा है। तीसरी सहस्नब्दि ईसा पूर्व में कोबाल्ट का प्रयोग मिस्र की मूर्ति कला और फारस के गहनों में देखने को मिलता था। इसके अलावा चीन के तुंग और मिंग शासनकालों में भी इसके इस्तेमाल प्रमाण मिलते हैं।

इस्तेमाल
औद्योगिक
कोबाल्ट-60 का उपयोग लेबलिंग डिवाइस में किया जाता है। इसके अलावा इसका प्रयोग इंडिस्ट्रयल रेडियोग्राफी में भी किया जाता है जो कि एक्स-रे प्रक्रिया की तरह होती है। यह किसी धातु में संरचनागत कमी तलाशते हैं।

मेडिकल
अस्पतालों में कोबाल्ट-60 का प्रयोग रेडियोथेरेपी में किया जाता है। साथ ही इसका प्रयोग विकृत हो चुकी रक्त वाहिकाओं और ब्रेन ट्यूमर को ठीक करने के लिए किया जाता है। इसके विकिरण का प्रभाव काम करने वाले व्यक्तियों पर न पड़े इसलिए इसको कवच में रखा जाता है।

अन्य इस्तेमाल
इसका प्रयोग मसालों और अन्य खानों के स्टरलाइजेशन के लिए किया जाता है।
स्वास्थ्य के खतरे
बाहरी तौर पर प्रभाव पड़ने से त्वचा के जलने की समस्या होती है, ज्यादा रेडिएशन की चपेट में आने से कमजोरी और यहां तक कि मृत्यु होने की संभावना होती है। कोबाल्ट-60 को लिवर, किडनी और हड्डियों के ऊतकों द्वारा अवशोषण करने से कैंसर होने की संभावना रहती है।

प्रमुख घटनाएं
दिल्ली हादसे से पूर्व कोबाल्ट-60 विकिरण के कुछ हादसे हो चुके हैं। इनमें से कुछ हैं..
- 1992- चीन में गायब हुए कोबाल्ट-60 के रेडिएशन से तीन लोगों की मौत
- 1996- कोस्टारिका में कोबाल्ट 60 रेडिएशन से 7 लोगों की मौत
- 2000- थाईलैंड में कोबाल्ट 60 के रेडिएशन से तीन लोग की मृत्यु
- 2000- पनामा में कोबाल्ट 60 रेडिएशन से 5 लोगों की मौत
कुछ दिनों पहले कैगा परमाणु बिजली संयंत्र में रेडियोएक्टिव पदार्थ पानी में मिला दिए जाने की घटना के बाद वहां के 50 कर्मचारी बीमार पड़ गए थे

क्या है रेडिएशन
ऊर्जा से निकलनी वाली एक्स रेज़, गामा किरणों, अल्ट्रावायलेट आदि किरणें ही रेडिएशन कहलाती हैं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के अनुसार आमतौर पर 88 प्रतिशत रेडिएशन प्राकृतिक स्रोतों मसलन सूर्य की रोशनी, भूमि से निकलने वाली ऊर्जा या कहीं-कहीं चट्टानों से निकलनी वाली गर्मी के कारण होता है। जबकि करीब 12 प्रतिशत रेडिएशन परमाणु बिजलीघरों या अन्य प्रतिष्ठानों, चिकित्सकीय उपकरणों तथा मोबाइल टावरों आदि से होता है। सूर्य के प्रकाश या भूमि से निकलने वाली ऊष्मा बहुत कम होती है, इसलिए इस रेडिएशन का खतरा मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत कम है।

कितना खतरा
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर प्रतीक कुमार के अनुसार यदि 100 लोगों को एक-एक मिली सीवर्ट (मिलीरेम) रेडिएशन दिया जाए तो इनमें से अधिकतम पांच लोगों को कैंसर होने के आसार रहते हैं। प्रोफेसर कुमार के अनुसार लेकिन जब चिकित्सा में विकिरण का इस्तेमाल होता है तो यह मात्रा एक मिली सीवर्ट से बहुत कम रखी जाती है। रोगी को उपचार के लिए सिर्फ एक माइक्रो सीवर्ट रेडिएशन दिया जाता है। माइक्रो सीवर्ट का मतलब है एक मिली सीवर्ट का लाखवां हिस्सा। अब यदि कैंसर होने की 5 प्रतिशत की आशंका की गणना की जाए तो यह लगभग नगण्य रह जाती है। इसलिए इसके उपचार के फायदे हमारे लिए कहीं ज्यादा हैं। दूसरे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति साल में अधिकतम 20 मिली सीवर्ट रेडिएशन से डोज लेता है तो इसका उसके स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव लगभग नगण्य असर होगा।

कैसे होती है जांच
प्रोफेसर कुमार के अनुसार रेडिएशन की जांच के लिए रेडिएशन मॉनिटर होता है। जब भी किसी व्यक्ति को उपचार के लिए रेडिएशन से गुजरना होता है या फिर किसी ऐसे प्रतिष्ठान में काम करता है, जहां रेडिएशन होता है तो उसे यह उपकरण साथ रखना होता है। इस मीटर के आंकड़ों की स्टडी परमाणु ऊर्जा नियामक एजेंसी द्वारा की जाती है। यदि कहीं विकिरण ज्यादा हो रहा होता है तो उसे कम किया जाता है। एक रोचक तथ्य, कैंसर अस्पतालों या परमाणु प्रतिष्ठानों में कार्य करने वाले हर व्यक्ति की रेडिएशन डोज का रिकार्ड रखा जाता है। ऐसा पेशेवर दुनिया में कहीं भी कार्य करे उसे रेडिएशन डोज के आंकड़ों का ब्यौरा भी सर्टिफिकेट आदि की तरह साथ लेकर जाना होता है।

कैंसर के बढ़ते मामलों की वजह
देश में कैंसर के बढ़ते मामलों की एक प्रमुख वजह भी रेडिएशन मानी गई है, लेकिन रेडिएशन के खतरों को लेकर लोगों में जागरूकता का अभाव है क्योंकि इसका खतरा प्रत्यक्ष नजर नहीं आता। हाई फ्रीक्वेंसी और लो फ्रीक्वेंसी रेडिएशन रेडिएशन से कई तरह कैंसर के खतरे होते हैं। एक्सरे, गामा किरणों, पराबैंगनी किरणों, इन्फ्रारेड किरणों, माइक्रोवेव, रेडियो फ्रीक्वेंसी या आम रोशनी से भी कैंसर का खतरा हो सकता है। रेडिएशन से अन्य खतरों में जन्म संबंधी विकार, रक्त संबंधी बीमारियां, त्वचा रोग प्रमुख होते हैं।

नहीं भूल सकती वो रात
आखिर भोपाल गैस त्रासदी कैसे भुलाई जा सकती है। 2 और 3 दिसंबर 1984 की रात को टैंक 610 में रिसाव शुरू हो गया। तीन और चार दिसंबर की रात तक भोपाल संयंत्र के स्टाफ को अंदाजा ही नहीं लग सका कि गैस रिसाव कितना गंभीर है। रेफ्रिजरेशन यूनिट बंद कर दिए जाने के कारण टैंक 610 को ठंडा नहीं किया जा सका। गैस को दूसरे टैंक में शिफ्ट भी नहीं किया जा सका क्योंकि सूचक तंत्र बता रहे थे कि वह टैंक भी भरा हुआ था जबकि वह बिलकुल खाली था। तब तक गैस को पानी से नम किया जा सकने के संबंध में भी बहुत देर हो चुकी थी। गैस धीरे-धीरे वहां के वायुमंडल में छाने लगी और देखते ही देखते उसने 20 वर्ग कि.मी. के क्षेत्र को अपने घेरे में ले लिया। इस हादसे में करीब पांच लाख लोग गैस से प्रभावित हुए। 2500 लोग तुरंत काल कवलित हो गए। हजारों लोग आने वाले कई दिनों तक मरते रहे और हजारों आज तक उस हादसे से उपजी बीमारियों और प्रशासनिक सुस्ती के साथ संघर्ष कर रहे हैं।

चरनोबेल हादसा
इतिहास की सबसे बड़ी नाभिकीय त्रासदी के तौर पर चरनोबेल को जाना जाता है। 26 अप्रैल 1986 को अविभाजित सोवियत संघ (मौजूदा उक्रेन) में नाभिकीय रिएक्टर के फटने से तकरीबन छह लाख लोग रेडिएशन के प्रभाव में आ गए थे और साढ़े तीन लाख लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा जिनमें से 60 प्रतिशत लोगों को बेलारुस में शरण लेनी पड़ी थी।

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