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बावरे से दिखते थे, इसलिए नाम पड़ा गुलशन बावरा

बावरे से दिखते थे, इसलिए नाम पड़ा गुलशन बावरा

फिल्म इतिहास की कई चुनिंदा फिल्मों में अपनी फनकारी का जादू चलाने वाले गुलशन बावरा का असली नाम गुलशन कुमार मेहता था, लेकिन बावरे से दिखने की उनकी अदा ने उन्हें नया नाम गुलशन बावरा दिया था।

फिल्म समीक्षक डॉ. श्रीराम ताम्रकार ने बताया कि फिल्म 'सट्टा बाजार' के निर्माण के दौरान गुलशन को अपना यह नाम मिला। फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर शांतिभाई पटेल गुलशन के काम से खासे खुश थे, लेकिन रंग-बिरंगी शर्ट पहनने वाले लगभग 20 साल के युवक की प्रतिभा को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।
   
डॉ. ताम्रकार ने बताया कि इसी के चलते पटेल ने गुलशन को देखकर कहा कि मैं इसका नाम गुलशन बावरा रखूंगा। यह बावरे (पागल व्यक्ति) जैसा दिखता है।

उन्होंने बताया कि फिल्म प्रदर्शित होने पर उसके पोस्टरों में सिर्फ तीन लोगों के नाम प्रमुखता से प्रदर्शित किए गए। एक फिल्म के निर्देशक रविंद्र दवे, संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी और बतौर गीतकार गुलशन बावरा।   

चुनिंदा फिल्मों में अपने अभिनय की भी छाप छोड़ने वाले गीतकार गुलशन को भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान बलवे के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। दंगों के दौरान उन्होंने अपने अभिभावकों की मौत अपनी आंखों के सामने होती देखी, जिसका दर्द पूरे जीवन उनके लिखे गानों में भी दिखाई दिया।

दिल्ली में कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने वाले गुलशन शुरू से ही मुंबई के फिल्म उद्योग में अपना करियर बनाना चाहते थे, लेकिन मुंबई में किसी को जानते नहीं थे। संयोग से उन्हें मुंबई में एक क्लर्क की नौकरी मिल गई, जिसके बाद 1955 में वह मुंबई आ गए।
   
गुलशन का इस नौकरी के साथ ही फिल्मों में संघर्ष का दौर शुरू हो गया। संघर्ष के दौरान कल्याणजी-आनंदजी ने गुलशन बावरा को चंद्रसेना का एक गाना लिखने का मौका दिया। गुलशन ने इसका फायदा उठाते हुए 'मैं क्या जानूं, कहां लागे ये सावन मतवाला रे' गाकर फिल्मों की दुनिया में अपनी फनकारी का कमाल दिखाया।
   
अपने 42 वर्ष के फिल्मी करियर में गुलशन ने सिर्फ 240 गीतों की रचना की। गुलशन ने एक इंटरव्यू में इस बात को स्वीकार किया था कि वह न तो बहुत ज्यादा काम करने में विश्वास रखते हैं और न ही काम के साथ समझौता करने में।

गुलशन ने कहा था कि मैं बहुत ज्यादा और आक्रामक तरीके से काम में विश्वास नहीं रखता। मैंने अपने समय में एक फिल्म के लिए 90,000 रुपये तक लिए वो भी ऐसे समय में जब कोई व्यक्ति 65,000 रुपये तक में एक बड़ा फ्लैट खरीद सकता था।

अपने काम के प्रति समर्पण के बारे में उन्होंने कहा था कि मैंने कभी अपनी कीमत से समझौता नहीं किया क्योंकि मैंने कभी अपने काम से समझौता नहीं किया।

फिल्म 'जंजीर' के 'यारी है ईमान मेरा' और 'उपकार' के 'मेरे देश की धरती सोना उगले' गीतों के लिए गुलशन को फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 7 अगस्त, 2009 को अनोखी प्रतिभा का धनी यह कलाकार हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह गया।

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