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अपराध बेलगाम, पिछले चार साल से वृद्धि का क्रम जारी

मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की की तर्ज पर बिहार में अपराध के मामले बेलगाम तरीके से बढ़ते जा रहे हैं। हालत यह है कि न्याय के साथ सुशासन की अच्छी अच्छी बातें करने वाली बिहार की नीतीश सरकार ने बढ़ते अपराधों पर काबू पाने के लिए कई उपाय किए पर पिछले चार साल से अपराधों का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। हालांकि इस दौरान कुल 95 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई, लेकिन अपराधियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।

बिहार की नीतीश सरकार ने नवंबर 2005 में सत्ता में आने पर न्याय के साथ सुशासन की बात कही थी, पर पिछले चार साल के उसके शासनकाल में प्रदेश में आपराधिक घटनाओं में वृद्धि का क्रम लगातार जारी है।

राज्य पुलिस मुख्यालय के मुताबिक वर्ष 2006 में संज्ञेय अपराध की कुल संख्या जहां 110716 थी वह वर्ष 2007,2008 और 2009 में बढ़कर क्रमश: 118176, 130693 और 133525 हो गयी।

बिहार में वर्ष 2009 में संज्ञेय अपराध के मामलों पर अगर गौर करें तो प्रदेश में हत्या की 3152, डकैती की 654, लूट की 1619, सेंधमारी की 3566, चोरी की 15221, दंगे की 8554, अपहरण की 3142, फिरौती के लिए अपहरण की 80, बलात्कार की 929, सड़क डकैती की 201, सड़क लूट की 962, बैंक डकैती की 7 और बैंक लूट की दो घटनाएं घटीं।

वर्ष 2005 में जब नीतीश सरकार सत्ता में आयी थी, उस समय संज्ञेय अपराध की कुल संख्या 104778 थी जिसमें हत्या के 3423, डकैती के 1191, लूट के 2379, सेंधमारी के 3166, चोरी के 11809, दंगा के 7704, अपहरण के 2226, फिरौती के लिए अपहरण के 251, बलात्कार के 973, सड़क डकैती के 224, सड़क लूट के 1310, बैंक डकैती के 26 और बैंक लूट के आठ मामले शामिल हैं।

बिहार में नीतीश सरकार के कार्यकाल में अगर पिछले चार साल की पुलिस उपलब्धियों पर नजर डालें तो वर्ष 2006, 2007, 2008 और 2009 के दौरान गिरफ्तार किए गए अपराधियों अथवा अभियुक्तों की संख्या क्रमश: 146231, 153758, 170921 और 182518 रही।

इस दौरान अपराधियों के साथ पुलिस की मुठभेड़ की संख्या क्रमश: 18, 18, 13 और 14 रही, जिसमें मारे गए अपराधियों की संख्या क्रमश: 15, 21, 12 और 15 रही। वर्ष 2009 में विभिन्न अपराधिक घटनाओं में 19 पुलिसकर्मी भी शहीद हुए जिसमें दो अवर निरीक्षक, एक सहायक अवर निरीक्षक, दो हवलदार, आठ आरक्षी और छह सैप के जवान शामिल थे।

इन चार सालों में अपराधियों के पास से क्रमश: 2999, 2264, 2110 एवं 2356 देशी हथियार तथा 195, 151, 94 और 77 नियमित हथियार बरामद किए गए। वर्ष 2009 में पुलिस ने नक्सलियों के पास से 11555 डिटोनेटर, 36848 किलोग्राम विस्फोटक, साठ मिनी गन फैक्ट्री, 1.40 करोड़ रूपये नकद राशि, 7.93 लाख भारतीय जाली मुद्रा, 1.61 लाख लीटर अवैध शराब बरामद की।

प्रदेश में वर्ष 2006 से लेकर 2009 के दौरान कुल 41845 लोगों को सजाएं सुनायी गयीं जिसमें से 95 को फांसी, 7688 को आजीवन कारवास, 2031 को दस वर्ष से अधिक और 32031 दस वर्ष से कम की सजा सुनायी गयी।

बिहार के अपर पुलिस महानिदेशक (मुख्यालय) पी के ठाकुर के अनुसार राज्य के थानों में नई व्यवस्था के तहत अब लोगों के लिए प्राथमिकी दर्ज कराना आसान हो गया है, इसलिए संज्ञेय अपराधों की संख्या में वृद्धि हुई।

उन्होंने बताया कि अगर आंकडों पर गौर किया जाए तो वर्तमान सरकार के कार्यकाल में गंभीर अपराधों की संख्या में कमी आयी है। उन्होंने बताया कि पहले चोरी, सेंधमारी और मारपीट जैसे छोटे अपराधों में रिपोर्ट दर्ज करने को लेकर पुलिस द्वारा आनाकानी की जाती थी पर अब ऐसे मामले भी पूरी मुस्तैदी के साथ पुलिस द्वारा दर्ज किए जा रहे हैं। ठाकुर ने कहा कि अपराध की घटना में वृद्धि का एक कारण आबादी का भी बढ़ना है क्योंकि बढ़ती आबादी के मुताबिक प्रदेश में पुलिस बल उपलब्ध नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि जहां देश में एक लाख की आबादी पर औसतन 120 पुलिस बल उपलब्ध हैं वहीं बिहार में इसकी संख्या प्रति एक लाख पर मात्र 60 है। ठाकुर ने बताया कि प्रदेश सरकार ने वर्ष 2009 में 2000 दरोगा की बहाली की थी और इस वर्ष करीब साढे 12 हजार सिपाहियों की बहाली करने जा रही है।

भारत सरकार की सुरक्षा संबंधी व्यय योजना (एसआरई) में शामिल बिहार के नक्सल प्रभावित 15 जिलों के पुलिस अधीक्षकों द्वारा अपने-अपने जिलों में आम जन का विश्वास जीतने के लिए जनसहयोग से सामुदायिक पुलिसिंग जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। इसके तहत उग्रवाद प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य कैम्प लगाना, निराश्रित बच्चों को स्कूल पहुंचाना, स्कूलों में वाद-विवाद एवं खेल-कूद प्रतियोगिता आदि का पुलिस थाना स्तर पर आयोजन किया जाना शामिल हैं।

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