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छटपटाहट है तो वजह भी है

झारखंड में सरकार बनाने और लोकसभा चुनाव के लिए तालमेल करने की यूपीए के घटक दलों में छटपटाहट की वजह है। तेरहवीं लोकसभा में झारखंड के 14 में से 12 सांसद भाजपा के ही थे। यूपीए ने पिछला लोकसभा चुनाव मिल-ाुलकर लड़ा तो भाजपा सिर्फ एक सीट पर जीत पाई। लेकिन कुछ ही महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में यूपीए बिखर गया तो राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए उसे तीन-तीन बार नैतिक-अनैतिक तरीके अपनाने पड़े। अंतत: वह सत्ता से बाहर हीहो गई।ड्ढr ड्ढr यूपीए के अलग-अलग सुर-ताल से एनडीए खेमे में थोड़ा सुकून तो है लेकिन उसके लिए मुश्किल बने हुए हैं पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी। मरांडी पहले भाजपा में ही थे। जब से उन्होंने विद्रोह किया, लगभग हर दूसर महीने उन्हें लौट आने का ‘निमंत्रण’ भाजपा का कोई-न-कोई नेता सुना जरूर जाता है। मरांडी ने कोडरमा से दुबारा जीतकर अपनी वकत भी दिखा दी है। एनडीए और यूपीए की तमाम ताकत के बावजूद वे जीतकर लोकसभा पहुंच गए। भाजपा को लगता है कि मरांडी उसके खेमे की ओर प्रत्यक्ष-परोक्ष न झुके तो उसे दिक्कत होगी। आखिर, 2004 में यूपीए की एकता की वजह से ही तो भाजपा के कई बड़े नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा था। तब की एनडीए सरकार में मंत्री-पद की शोभा बढ़ाने वालों- यशवंत सिन्हा, रीता वर्मा, नागमणि और पार्टी के वरिष्ठ केंद्रीय नेता कड़िया मुंडा तक चुनाव हार गए थे।ड्ढr ड्ढr रांची क्षेत्र से लगातार चार बार जीतते आए रामटहल चौधरी और जमशेदपुर से तीन बार की सांसद आभा महतो को भी करारी हार का सामना करना पड़ा था। इसकी वजह थी- यूपीए में सीटों का बेहतर तालमेल। आलम यह था कि हाारीबाग से यशवंत सिन्हा को शिकस्त देने के लिए कांग्रेस, राजद और झामुमो ने सीपीआई के भुवनेश्वर मेहता को बिना शर्त समर्थन दिया। यूपीए के प्रमुख विजयी उम्मीदवारों में दुमका से झामुमो के शिबू सोरन, रांची से कांग्रेस के सुबोधकांत सहाय, लोहरदगा से कांग्रेस के रामेश्वरउरांव एवं खूंटी से कांग्रेस कीएकमात्र महिला उम्मीदवार सुशीला केरकेट्टा रहीं।ड्ढr दूसरी ओर, एनडीए में सीटों का तालमेल नहीं था। कई सीटों पर जद (यू) ने भाजपा के खिलाफ उम्मीदवार खड़े कर दिए। इस कारण जीतनेवाली सीटें भी भाजपा हार गई।

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