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जवानों की चिताओं से उठते धुएं के सबक

जब से दंतेवाड़ा का हादसा हुआ है मेरे मन में रह रह कर रामधारी सिंह दिनकर की पक्तियां उमड़-घुमड़ रही हैं-
छीनता हो स्वत्व कोई, और तू
त्याग-तप से काम ले यह पाप है।
पुण्य है विछिन्न कर देना उसे
बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ हो।

एक तरफ पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ है और दूसरी तरफ सियासी योद्धा अपने ही जवानों की चिंताओं पर निजी स्वार्थ की रोटियां सेंकने में लगे हैं। आहत गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने इस्तीफा दे दिया पर उसके मूल को समझे बिना सियासत हो रही है। इस समय जब सबसे बड़ा मुद्दा यह होना चाहिए कि हम अपने सुरक्षा बलों को और कारगर कैसे बनाएं। निरंतर बहस में बहुमूल्य समय गंवाया जा रहा है। किसी को चिंता नहीं कि इससे नक्सलवादियों को समय मिल रहा है, जिसका उपयोग वे और मजबूत होने में करेंगे।

सबसे पहले अर्धसैनिक बलों की बात- कहने को हमारे देश में कुलजमा एक दजर्न अर्धसैनिक बल हैं और इनमें 13 लाख से अधिक जवान काम करते हैं। तर्कशास्त्री कह सकते हैं कि दुनिया में इतनी बड़ी संख्या में किसी भी देश के पास अर्धसैनिक दस्ते नहीं हैं। कुछ मानवाधिकारवादी इसको लेकर हो-हल्ला भी मचाते रहे हैं, पर अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, सांप्रदायिकता और अलगाववाद से जूझ रहे इतने बड़े देश के लिए इतने जवान नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं।

आमतौर पर इनका काम कानून का पालन कराने वाली एजेंसियों और सशस्त्र सेनाओं की सहायता करना है, पर इन्हें कैसे-कैसे कामों में झोंक दिया जाता है। बाढ़ आती है तो इन बलों के जवान बंदूक छोड़कर आफत के मारों की मदद के लिए निकल पड़ते हैं। आग की लपटें जब दावानल का रूप धारण कर रही होती हैं, तब ये अग्निशिखाओं और उनके सताए लोगों के कष्टों से लोहा लेते नजर आते हैं। गुजरात में भूकंप आया तो केन्द्रीय बलों के लोग वहां भी मुस्तैद दिखाई पड़ते थे। 

इन बलों में भी सबसे ज्यादा आफत केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के लोगों की है। एक सिपाही के नजरिए से सोचें, तो उसे तरह-तरह के बवालों से जूझना पड़ता है। उत्तर-पूर्व में वह अराजकता से, तो कश्मीर में आतंकवाद से लड़ता है। देश के दिल में कैंसर की तरह तेजी से फैल रहे नक्सलवादियों से जूझने के लिए वह घने जंगलों की खाक छानता है और जब भी किसी राज्य की पुलिस को जरूरत होती है, तो उसके जवान सैकड़ों मील से दौड़े चले आते हैं।

अब बताइए इन नानाविद कामों के लिए क्या उसे ट्रेनिंग मिली होती है? ऐसा कौन सा प्रशिक्षण पाठ्यक्रम है जो इतनी सारी आफतों से जूझने का रास्ता सुझा सकता है? यही वजह है कि इन बलों के जवानों को अक्सर बेमौत मरने के लिए बाध्य होना पड़ता है। आंकड़े गवाह हैं कि नक्सली हिंसा में 2009 की शुरुआत से लेकर अब तक 452 जवान खेत रहे हैं। इसके मुकाबले जम्मू-कश्मीर में यह संख्या बहुत कम है। वहां इस दौरान 96 जवान शहीद हुए। मतलब साफ है।

नक्सलवाद की समस्या कश्मीर के खौफ को भी पीछे छोड़ चुकी है। वक्त ने साफ कर दिया है कि वहां दुश्मन का चेहरा काफी कुछ स्पष्ट नजर आता है, इसलिए उन्हें ढूंढ़ना और मारना आसान है। पर इन नक्सलियों का क्या करेंगे? आदिवासियों के बीच छिपी इनकी छापामार टीमें बड़ी सहजता से जंगल की जमीन और उसके बच्चों के बीच गुम हो जाती हैं। 

दंतेवाड़ा में भी जब सैकड़ों लोगों ने इन्हें घेरा होगा तो यकीनन सीआरपीएफ के जवानों के हाथ गोली चलाने से पहले कांपे होंगे। वे सिपाही हैं, हत्यारे नहीं। आम आदमी और तो और बच्चों पर न तो उन्हें गोली चलाना सिखाया गया है और न ही उनका दिल इसकी गवाही देता है। 

अगर ऐसा नहीं होता तो हमें अपने जवानों के साथ हमलावरों की लाशें भी गिनने को मिलती। मैंने अपनी आंखों से कश्मीर और उत्तर-पूर्व में सीआरपीएफ के जवानों के संयम को जांचा-परखा है। दो दशक होने को आए, इस फोर्स के लोगों के साथ मुङो मणिपुर और नगालैंड के कई हिस्सों में जाने का मौका मिला था। तब मैंने पाया था कि इन जवानों के पास न तो पहनने के लिए कायदे के जूते हैं और न जान बचाने के लिए हेलमेट और बुलेट प्रूफ जैकेट।

हमारी सरकारें बतौर आर्थिक महाशक्ति चीन और अमेरिका से लोहा लेने की शोशेबाजी तो करती हैं, परंतु क्या उन्होंने कभी अपने जवानों की ओर भी देखा है जो निहायत प्रतिकूल परिस्थितियों में मोर्चा संभाले रहते हैं। मणिपुर में बरसते बादलों के नीचे गश्त करते इन लोगों को  देखकर कलेजा मुंह को आ गया था। उनमें से अधिकांश के पास बरसातियां भी नहीं थीं। तब मैंने कल्पना की थी कि इन पर घात वाला हमलावर तो पूरी तैयारी से आता है।

अगले ही दिन इसका प्रमाण देखने को मिला था। सीआरपीएफ के क्षेत्रीय मुख्यालय में खबर आई थी कि थोड़ी ही दूर पर कूकी उग्रवादियों ने एक नगा गांव पर हमला कर दिया है वे औरतों और बच्चों को मार पाते इससे पहले ही सीआरपीएफ के दस्तों ने उनसे लोहा लिया और मार भगाया। मैं भी अधिकारियों के साथ वहां गया था। एक तरफ वे जवान कतार में खड़े थे जिन्होंने गांव के लोगों की रक्षा की थी, उनमें से बहुतों के जूते अभी तक भीगे हुए थे। पास में ही कूकियों के छिपने का वह अड्डा भी था जहां से उन्होंने घात लगाई थी।

बारिश प्रूफ बरसाती, पानी की बोतलें, डबलरोटियां, अण्डे और बिखरी हुई हड्डियां बयान कर रहीं थीं कि वे काफी देर वहां छिपे रहे थे। गश्त करने वाले सिपाहियों से कहीं ज्यादा आराम में, कहीं अधिक महफूज। वहीं पास की सीआरपीएफ की चौकी में मेरे एक साथी ने बुलेट प्रूफ जैकेट पहनकर बीस कदम चलने की कोशिश की, वे लड़खड़ा गए थे, क्योंकि यह जैकेट उनके अनुमान से कहीं अधिक भारी थी।

किसी ने तब भी बताया था कि एक सिपाही को 36 किलो वजन अपने ऊपर लादकर चलना होता है। आमतौर पर यह भार उनके अपने वजन के आधे से ज्यादा होता है। तभी मन में सवाल उभरा था कि हम इन्हें कब जरूरत भर की सुविधा मुहैया करवा पाएंगे। ये जागते हैं, तभी हम सोते हैं। ये भार उठाकर इसलिए दौड़ते हैं ताकि देश पर लदा आतंक का वजन कुछ कम हो सकें।

तब से लगभग दो दशक बीत गए। हालात बनने के बजाय और बिगड़ गए हैं। आतंक और अलगाव का दायरा कई गुना फैल गया है। इसके साथ ही अर्धसैनिक बलों की जिम्मेदारियां भी कई गुना बढ़ गई हैं। सवाल उठता है कि ये लोग अगर हमारे लिए जी और मर रहे हैं तो हम और हमारी सरकारें उनके  लिए क्या कर रही हैं? निर्थक बहस कि दंतेवाड़ा में मरे लोग प्रशिक्षित थे या अप्रशिक्षित? सवाल यह नहीं है कि वे किस वजह से मरे। 

सवाल यह है कि वे क्यों मरे? किनके लिए मरे और उनकी मौत से हमने कोई सबक लिया या नहीं? अफसोस। संसद मौन है और सांसद जुबानी जंग में उलझे हुए हैं। पता नहीं कब ये चेतेंगे और उन पर नजर डालेंगे जो जान की बाजी लगाकर असली जंग लड़ रहे हैं। ये हमारे सैनिक हैं कोई गिनीपिग नहीं कि उन्हें बिना सोचे- समझे मौत के मुंह में झोंक दिया जाए।

shashi.shekhar@hindustantimes.com

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