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सुचाँद सोरेन के संग्राम की प्रेरणादायक गाथा

क्या आजीवन अवहेलित रहना ही आदिवासियों की नियति है? यह तथ्य मुझे बहुत पीड़ा पहुँचाता है कि वाममोर्चा भी आदिवासियों के प्रति असहिष्णु रहा है। पश्चिम बंगाल के वाम राज में बड़े संग्रामी नेता भी इसलिए उपेक्षित रहे क्योंकि वे आदिवासी थे। सुचाँद सोरेन इसके साक्षात सबूत हैं। सुचाँद सोरेन उन संग्रामी संथालियों में थे जिन्होंने बाँकुड़ा और आस-पास कम्युनिस्ट आंदोलन को खड़ा किया था।

सुचाँद युवावस्था में ही कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गए थे। बीसवी सदी के छठे दशक में सुचाँद ने अपने अंचल के परिरक्षण और सप्रीति पोषण का दायित्व स्वेच्छा से अपने सिर उठाया था और मृत्युर्पयत यानी 13 सितंबर 2003 तक वे यह दायित्व कुशलतापूर्वक निभाते रहे। अपने संथाली समुदाय के प्रति सम्मान-सजग, दूसरे समुदायों के प्रति सहृदय-वत्सल और पूरे अंचल के हितसाधन में सतत सक्रिय रहने के कारण ही इलाके में उनकी साख क्रमश: बढ़ती गयी थी।

सुचाँद ने स्वयं गरीबी का दंश झेला था। वे एक दरिद्र आदिवासी परिवार में जन्मे थे। अभाव के कारण ही वे ढंग से शिक्षा भी हासिल नहीं कर पाए। फीस और किताबों के पैसे नहीं होने के कारण कई बार स्कूल से उनका नाम कटा। अन्तत: उन्होंने अपनी गरीबी को विस्मृत कर इलाके के गरीबों के हितों की रक्षा का बीड़ा उठाया और अपने जीवन के पाँच दशक उन्हीं की सेवा और उपासना में लगाया।

सुचाँद सोरेन के कारण ही बाँकुड़ा के गरीब और भूमिहीन आदिवासियों के बीच एक लाख बीघा जमीन बाँटी जा सकी थी। यह भी तथ्य है कि सुचाँद के कारण ही बाँकुड़ा के आदिवासी कम्युनिस्ट समर्थक हुए। सुचाँद ने भी आदिवासियों के भरोसे की रक्षा की। 1959-61 में रानी बाँध अंचल में जब कन्सावती आंदोलन शुरू हुआ तो उसका सुचाँद ने ही नेतृत्व किया। आंदोलन करते हुए वे गिरफ्तार किए गए और महीने भर जेल में रहे। जब भी जनता पर संकट आया, वे उसके साथ तन कर खड़े रहे।

सुचाँद की लोकप्रियता को देखते हुए हरेष्ण कोंगार ने उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर मेमारी से 1962 में विधानसभा चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया। सुचाँद विधायक चुने गए। 1969 में वे राणा बाँध से विधायक बने। कुल तीन बार वे विधायक रहे। हर कार्यकाल में विधानसभा में उन्होंने आदिवासियों के हितों के सवाल प्रमुखता से उठाए। बाँकुड़ा में जब सिंचाई सुविधाओं को लेकर अनियमितताएं सामने आयीं तो पार्टी के कई लोग उसे दबाने में लग गए, लेकिन सुचाँद ने यह मामला विधानसभा में उठाया। इससे पार्टी नेतृत्व नाखुश हो गया और उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

पार्टी से बहिष्कृत होने के बाद सुचाँद अखिल भारतीय विकास परिषद से जुड़े और उसी के बैनर तले आदिवासी कल्याणकारी योजनाओं को अमली जामा पहनाते रहे। आदिवासियों में शिक्षा के प्रसार के क्षेत्र में अखिल भारतीय विकास परिषद ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। इसी के समानांतर सुचाँद सोरेन ने आदिवासियों की संस्कृति के संरक्षण के लिए भी अनथक प्रयास किए। 

विधायक रह चुकने के बाद भी सुचाँद गरीबी में ही रहे। हालत यहाँ तक पहुँची कि एक बंडल बीड़ी के लिए खातड़ा से मसीयाड़ा तक दस-दस किलोमीटर दूर पैदल जाते थे और अपने मित्र से बीड़ी का बंडल लेकर वापस आ जाते थे। गरीबी के कारण जीवन के आखिरी वषों में उन्हें दो जून की रोटी का मयस्सर होना भी दूभर हो गया था। लगातार अभाव और अनाहार से वे कमजोर पड़ते गए और स्मरण शक्ति भी गंवा बैठे। वे हृदय रोग की चपेट में भी आ गए। पैसे के अभाव में उनका समुचित इलाज भी संभव नहीं हो पा रहा था।

दुर्गापुर के एक सज्जन ने उन्हें तीन सौ रुपये भेजे तो कुछ दिन तक इलाज चला, उसके बाद फिर दुर्दिन। दुर्दिन में भी सुचाँद संजीदा मानुष बने रहे। अन्तत: अभाव और इलाज की कमी के कारण वे चल बसे। उनके बच्चे आज अपने पैतृक गाँव करकुटिया में दिहाड़ी मजदूरी कर कठिन जीवन संग्राम चला रहे हैं। सुचाँद ने साबित किया था कि पार्टी से हटाये जाने के बाद भी सच्चा वामपंथी कैसे बने रहा जा सकता है। उन्होंने यह भी साबित किया था कि आदिवासी अभाव और अपमान के बावजूद अपने विवेक को भ्रमित-दूषित नहीं होने देता। क्या सभ्य समाज को इससे प्रेरणा नहीं लेनी चाहिए?

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  • Web Title:सुचाँद सोरेन के संग्राम की प्रेरणादायक गाथा