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माहौल से उदासीन रचना कमजोर होती है

पंजाबी भाषा के कवि सुरजीत पातर की गिनती देश के उन रचनाकारों में होती है जो आम लोगों की समस्याओं और उनके रोजमर्रा के द्वंद्व से जुड़े हैं। ‘हवा विच लिखे हर्फ’, ‘लफ्जां दी दरगाह’ जैसे कई महत्वपूर्ण काव्य संग्रह देने वाले पातर ने विदेशी भाषाओं से पंजाबी में कई महत्वपूर्ण अनुवाद भी किए हैं। पिछले दिनों जब उन्हें सरस्वती सम्मान देने की घोषणा हुई तो उनसे रूबरू हुए संजीव माथुर।

आपने शिरोमणि अवार्ड क्यों ठुकराया था?
मेरा मानना है कि पुरस्कारों में राजनीतिज्ञों का दखल नहीं होना चाहिए। इस पुरस्कार देने की प्रक्रिया में राजनीतिज्ञों का खासा दखल था। यह मुझे गवारा नहीं था सो मैंने यह पुरस्कार ठुकरा दिया। आज बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी पुरस्कारों को प्रायोजित कर रही हैं?

देखिए अगर ये संस्था या अकादमी की नीतियों को प्रभावित नहीं करती है और मात्र प्रायोजक बनी रहें तो ठीक है, पर ऐसा होता है नहीं। वैसे इसके पीछे की असली दिक्कत को समझना चाहिए। आज हमारी सरकार ने ही ऐसे मसलों को अपनी प्राथमिकता के दायरे से बाहर कर दिया है। इस कारण एक खालीपन पैदा हुआ है।

इस खालीपन को ये कंपनियां अपने तौर-तरीकों से भरेंगी ही। सवाल यह है क्या हमें ऐसा होने देना चाहिए या नहीं। वैसे ऐसे मामलों में सरकार और इनकी मिलीभगत भी होती है। कंपनियां अपने प्रचार के वास्ते ऐसे रास्ते तलाशेंगी। ये संस्थाएं जनता के पैसे से चलती हैं और किसी सरकार को अधिकार नहीं है कि वह इस पैसे का दुरुपयोग करें या उसे हानि पहुंचाए।

साहित्य का राजनीति से कैसा रिश्ता होना चाहिए?
प्रतिरोध की राजनीति साहित्य के फोकस में होनी चाहिए। व्यंग्य इसमें एक कारगर औजार हो सकता है। जैसे कि मैंने गहरे क्रंदनों को क्या मापना में कहा है कि ‘जद तक उह लाशां गिणदें आपा वोटां गिणिए’ (जब तक वह लाशों को गिनते हैं हम वोटों को गिने)। सुलगता जंगल में भी आप इसकी झलक देख सकते हैं। साहित्य और लेखक की अपने वक्त के प्रति एक जिम्मेदारी यह भी होती है कि वह इसको साफ-साफ देखें और दिखाएं। ध्यान रखना चाहिए कि हम चाहे या न चाहें राजनीति या अपने माहौल से उदासीन होकर की गई साहित्य की रचना कमजोर होती है। उसमें मानवीय उष्मा की गरिमा नहीं होती है। साहित्य या रचना में हमारी मैं भी सिर्फ हमारी मैं नहीं होती है वह कवि खुद ही नहीं होता है।

क्या रचना एक निजी मामला नहीं है?
देखिए, कवि या लेखक की मैं भी उसने खुद नहीं बनाई होती है। वह भी समाज से उसने पाई है। इसीलिए रचना एक हद ही निजी होती है पर उसके बावजूद वह होती है एक सामाजिक प्रक्रिया का हिस्सा।

वैश्वीकरण का हमारे समाज पर क्या असर पड़ा है?
वैश्वीकरण के प्रक्रिया ने सरकार की संकल्पना को कमजोर किया है। आज हमारी सरकारें बस लॉ एंड ऑर्डर का थाना भर बन कर रह गई हैं। शिक्षा और सेहत की जिम्मेदारी सरकार को उठानी चाहिए, पर कानूनों के बावजूद सरकारें इसे लागू करने से बच रही हैं। वह इसे किसी और के कंधे पर डालना चाह रही हैं। शिक्षा की तो एक लहर चलनी चाहिए। शिक्षा में असमानता खत्म होनी चाहिए। इसी असमानता के कारण गांवों के बच्चे अच्छे विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं ले पाते हैं। सेहत के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। शिक्षा और सेहत सबकी पहुंच में हो और यह करने की जिम्मेदारी सरकार की है न की बाजार की। इसके अलावा वैश्वीकरण की बयार ने हमारे मानवीय संबंधों को भी खासा प्रभावित किया है।

दंतेवाड़ा की घटना को आप कैसे देखते हैं?
दुख की आवाज को कठोर होकर हथियार बनने से पहले ही सुन लिया जाना चाहिए। हिंसा के कई रूप होते हैं। एक जो दिखाई देता है। दूसरा वह जो अदृश्य है। वहां के आदिवासियों के साथ जरुर ऐसा कुछ हुआ जिससे उनका हमारी विकास की अवधारणा से भरोसा उठा है। विकास लादा नहीं जा सकता है। इसे लोगों की भावनाओं के अनुरूप होना चाहिए। आज असली मुद्दे पीछे चले गए हैं। मीडिया भी इन मुद्दों फोकस में लाने में असफल रहा है। इस वजह से लोग भी इस पर सही राय कायम नहीं कर पा रहे हैं।

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