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माओवाद से टक्कर लेता कॉर्पोरेट वकील

पी. चिदम्बरम प्रयोगधर्मी राजनीतिज्ञ हैं। वामपंथी विचारधारा से लेकर कांग्रेस की मध्यमार्गी विचारधारा तक की उनकी राजनीतिक यात्रा अनेक प्रयोगों की साक्षी है। इन्हीं प्रयोगों की कड़ी में उनका तमिल मानेल्ला कांग्रेस में जाना और फिर उसको भी छोड़ कर अपनी क्षेत्रीय पार्टी कांग्रेस जननायक पेरावाई बनाना शामिल है।

तमिल मानेल्ला कांग्रेस में रहते हुए उन्हें राजनीति में विशेष पहचान मिली। 1996 में जब केन्द्र में कई क्षेत्रीय पार्टियों को मिला कर देवगौड़ा की सरकार बनी, तो मानेल्ला कांग्रेस के कोटे से चिदम्बरम वित्तमंत्री बने। सरकार ज्यादा चली नहीं लेकिन चिदम्बरम का जादू चल निकला था। अपनी प्रयोगधर्मी दृष्टि के नाते ही वे अपने विचारों पर कायम रहते हैं और उसके लिये हर कीमत चुकाने के लिये भी तैयार रहते हैं।

दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले की जिम्मेदारी लेना और अपने इस्तीफे की पेशकश करना उनकी इसी सोच का हिस्सा है। देश को लंबे समय के बाद एक सक्रिय गृहमंत्री मिला है। वह चाहे नक्सलियों की मांद हो या आतंकियों की, वे वहीं जाकर उन्हें ललकारते हैं। उनका देशवासियों के लिये सूत्र वाक्य है- मैं हूं ना! यह वाक्य पहली बार उन्होंने अपने बजट भाषण में कहा था और अब भी उसी नक्शेकदम पर हैं।

विचारों के प्रति उनको दृढ़ता अपने पिता के फौजी अनुशासन से मिली है। पिता एल. पालनिअप्पा सेना में लेफ्टीनेन्ट कर्नल थे। 16 सितम्बर 1945 में तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में जन्मे चिदम्बरम की शुरुआती शिक्षा मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज हायर सेकेंडरी स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने प्रेसिडेन्सी कॉलेज, चेन्नई से बीएससी की और फिर मद्रास लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने एमबीए हारवर्ड बिजनेस स्कूल से किया। 1969 में वे बतौर एडवोकेट मद्रास हाईकोर्ट में पंजीकृत हुए।

इसके बाद 1984 में उन्हें सीनियर एडवोकेट का ओहदा दिया गया। इस दौरान उनकी वकालत ने बुलंदियां छुईं। कारपोरेट क्षेत्र के वे मशहूर वकील हैं। पहली बार कांग्रेस टिकट से उन्होंने 1984 में शिवगंगा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और राजीव गांधी की कैबिनेट में डिप्टी मिनिस्टर फॉर कॉमर्स बने। इसके बाद उन्होंने छ: बार इसी सीट से चुनाव लड़ा और हर बार जीत दर्ज की।

चिदम्बरम राजीव गांधी के विशेष चहेते थे। उनकी हत्या के बाद थोड़े दिन वे हाशिये पर जरूर रहे लेकिन मुख्यधारा में वापसी करने में उन्हें देर नहीं लगी। मनमोहन सिंह की ब्रेन चाइल्ड मानी जाने वाली आर्थिक उदारीकरण की नीति को व्यावहारिक रूप से अमली जामा पहनाने वालों में चिदम्बरम सिरमौर माने जाते हैं। अब जब वह केन्द्रीय गृहमंत्री का दायित्व संभाल रहे हैं, तो वे सीमा पार और देश की सीमा के अंदर चल रहे युद्ध से लोहा लेने निकले हैं। चुनौतियां तो उनके सामने बहुत हैं, लेकिन वे उनसे मोर्चा लेते हुए दिख रहे हैं।     

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