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प्रखर पत्रकार भी थे साहित्यकार रेणु

प्रखर पत्रकार भी थे साहित्यकार रेणु

'मैला-आंचल' और 'परती परिकथा' उपन्यासों के जरिए साहित्य के फलक पर अमिट छाप छोड़ गए आचंलिक उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु को गांव और ग्रामीण संस्कृति से खासा लगाव था। उनके उपन्यास, कविता, रिपोतार्ज, पाठकों को अत्यंत प्रिय हैं।

साहित्य की कई विधाओं में रेणु ने बराबर अधिकार के साथ कलम चलाई। बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गांव [अब अररिया जिले में] में चार मार्च, 1921 को जन्मे रेणु 11 अप्रैल 1977 को अनंत की ओर प्रयाण कर गए।

रेणु का उदय हिंदी कथा साहित्य में वर्ष 1954 में हुआ, जब उनकी सर्वोत्तम कृति 'मैला आंचल' प्रकाशित हुई। ऐसा नहीं है कि इससे पहले उन्होंने कुछ भी नहीं लिखा। सच्चाई यह है कि 'मैला आंचल' के प्रकाशन से पूर्व उन्होंने लगभग 20 वर्षो की लंबी लेखकीय यात्रा पूरी कर ली थी। रेणु के साहित्य मर्म तक पहुंचने के लिए आंचलिकता के रास्ते गुजरना ही होगा। उनकी रचनाओं में  अनछुए पहलुओं का ऐसा रचनात्मक रूप है जो विचार और संवेदना के धरातल पर अपनी मौजूदगी का अहसास आज पहले से भी ज्यादा शिद्दत से करवाता है।

रेणु का रचना संसार विलक्षण है, क्योंकि यह शब्द-शिल्पी पात्रों और परिवेश को एकाकार करना जानता था। वह हमेशा कहते थे कि उनके दोस्तों ने उन्हें काफी कुछ दिया। उन्हें चाहने वालों में साहित्यिक बिरादरी के अलावा आम पाठक भी हैं, जिन्हें रेणु के शब्दों से एक नितांत निजी किस्म का लगाव है। रेणु जैसे महत्वपूर्ण कथाशिल्पी का पत्रकार होना अपने आप में कम रोचक नहीं है।

उन्होंने अपने रिपोतार्जों के जरिए हिंदी पत्रकारिता को अपनी सृजनशीलता से समृद्ध किया। 'एकांकी के दृश्य' पुस्तक में उनके रिपोतार्जो को संकलित किया गया है। उन्होंने बिहार की राजनीति, समाज-संस्कृति को लेकर 'दिनमान' पत्रिका के लिए स्तंभ लेखन किया।
रेणु अपनी कृतियों में पात्रों के मनोवैज्ञानिक सोच का विवरण लुभावने तरीके से करते थे। उनके पात्र आज भी उतने ही जीवंत हैं। उनकी कहानियों के पात्र सामान्य-सरल मानव मन के अद्भुत बिंब हैं। उनकी लगभग हर कहानी में पात्रों की सोच, घटनाओं से प्रधान होती थी। 'एक आदिम रात्रि की महक' इसका एक सुंदर उदाहरण है।

रेणु की लेखन-शैली प्रेमचंद से काफी मिलती थी और इन्हें 'आजादी के बाद का प्रेमचंद' की संज्ञा भी दी जाती है। अपनी कृतियों में उन्होंने आंचलिक पदों का बहुत प्रयोग किया है। अगर आप कोसी अंचल से हैं तो, निहायत ही ठेठ या देहाती समझते जाने वाले शब्दों को रेणु की रचनाओं के माध्यम से अपने आस-पास आचंलिकता की सोंधी महक बिखेरते हुए पाएंगे।

कथाशिल्पी रेणु की दुनिया एक ऐसी दुनिया है जो कीचड़ और चंदन से सनी हुई है। वह दुनिया बंद दिलो-दिमाग या बंद कमरों की दुनिया को तोड़ती हुई 'मैला आंचल', 'परती परिकथा', 'रसप्रिया' 'तीसरी कसम', 'पंचलाइट' जैसी रचनाओं से होकर अपना रास्ता बनाती है और पाठक के मन में बस जाती है। वह दुनिया हमें प्रशांत (मैला आंचल का पात्र) की गहरी मानवीय बेचैनी से जोड़ती है, हीरामन (तीसरी कसम का पात्र) की सहज, आत्मीय आकुलता से जोड़ती है। वह हमें ऐसे रागों, रंगों और जीवन की सच्चाई से जोड़ते हैं जिसके बिना यह दुनिया ही अधूरी है।

भले ही रेणु ने वर्ष 1977 में ही इस दुनिया से विदा ले ली, लेकिन वे आज भी बहस-मुबाहिसों और पाठकों के बीच पूरी प्रासंगिकता के साथ मौजूद हैं। उनकी रचनाएं मानवीय सच का यह पहलू तो उजागर करती ही हैं कि मनुष्य की आकृति या रूप रंग की कसौटी पर उसके व्यक्तित्व को मापना मानवीयता के आधारभूत सच को अस्वीकार करना है।

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