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शुभ ग्रह हमेशा शुभ नहीं होते

शुभ ग्रह हमेशा शुभ नहीं होते

ज्योतिषीय नियम है कि कुंडली में अशुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल का ह्वास और शुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल की समृद्धि होती है। जैसे, मानसागरी में वर्णन है कि केन्द्र भावगत बृहस्पति हजारों दोषों का नाशक होता है। किन्तु, विडंबना यह है कि सप्तम भावगत बृहस्पति जैसा शुभ ग्रह जो स्त्रियों के सौभाग्य और विवाह का कारक है, वैवाहिक सुख के लिए दूषित सिद्ध हुआ हैं।

यद्यपि बृहस्पति बुद्धि, ज्ञान और अध्यात्म से परिपूर्ण एक अति शुभ और पवित्र ग्रह है, मगर कुंडली में सप्तम भावगत बृहस्पति वैवाहिक जीवन के सुखों का हंता है। सप्तम भावगत बृहस्पति की दृष्टि लग्न पर होने से जातक सुन्दर, स्वस्थ, विद्वान, स्वाभिमानी और कर्मठ तथा अनेक प्रगतिशील गुणों से युक्त होता है, किन्तु ‘स्थान हानि करे जीवा’ उक्ति के अनुसार यह यौन उदासीनता के रूप में सप्तम भाव से संबन्धित सुखों की हानि करता है। प्राय: शनि को विलंबकारी माना जाता है, मगर स्त्रियों की कुंडली के सप्तम भावगत बृहस्पति से विवाह में विलंब ही नहीं होता, बल्कि विवाह की संभावना ही न्यून होती है।

यदि विवाह हो जाये तो पति-पत्नी को मानसिक और दैहिक सुख का ऐसा अभाव होता है, जो उनके वैवाहिक जीवन में भूचाल आ जाता हैं। वैद्यनाथ ने जातक पारिजात, अध्याय 14, श्लोक 17 में लिखा है, ‘नीचे गुरौ मदनगे सति नष्ट दारौ’ अर्थात् सप्तम भावगत नीच राशिस्थ बृहस्पति से जातक की स्त्री मर जाती है। कर्क लग्न की कुंडलियों में सप्तम भाव गत बृहस्पति की नीच राशि मकर होती है। व्यवहारिक रूप से उपयरुक्त कथन केवल कर्क लग्न वालों के लिए ही नहीं है, बल्कि कुंडली के सप्तम भाव अधिष्ठित किसी भी राशि में बृहस्पति हो, उससे वैवाहिक सुख अल्प ही होते हैं।

एक नियम यह भी है कि किसी भाव के स्वामी की अपनी राशि से षष्ठ, अष्टम या द्वादश स्थान पर स्थिति से उस भाव के फलों का नाश होता है। सप्तम से षष्ठ स्थान पर द्वादश भाव- भोग का स्थान और सप्तम से अष्टम द्वितीय भाव- धन, विद्या और परिवार तथा उनसे प्राप्त सुखों का स्थान है। यद्यपि इन भावों में पाप ग्रह अवांछनीय हैं, किन्तु सप्तमेश के रूप में शुभ ग्रह भी चंद्रमा, बुध, बृहस्पति और शुक्र किसी भी राशि में हों, वैवाहिक सुख हेतु अवांछनीय हैं। चंद्रमा से न्यूनतम और शुक्र से अधिकतम वैवाहिक दुख होते हैं। दांपत्य जीवन कलह से दुखी पाया गया, जिन्हें तलाक के बाद द्वितीय विवाह से सुखी जीवन मिला।

पुरुषों की कुंडली में सप्तम भावगत बुध से नपुंसकता होती है। यदि इसके संग शनि और केतु की युति हो तो नपुंसकता का परिमाण बढ़ जाता है। ऐसे पुरुषों की स्त्रियां यौन सुखों से मानसिक एवं दैहिक रूप से अतृप्त रहती हैं, जिसके कारण उनका जीवन अलगाव या तलाक हेतु संवेदनशील होता है। सप्तम भावगत बुध के संग चंद्रमा, मंगल, शुक्र और राहु से अनैतिक यौन क्रियाओं की उत्पत्ति होती है, जो वैवाहिक सुख की नाशक है।

‘‘यदि सप्तमेश बुध पाप ग्रहों से युक्त हो, नीचवर्ग में हो, पाप ग्रहों से दृष्ट होकर पाप स्थान में स्थित हो तो मनुष्य की स्त्री पति और कुल की नाशक होती है।’’सप्तम भाव के अतिरिक्त द्वादश भाव भी वैवाहिक सुख का स्थान हैं। चंद्रमा और शुक्र दो भोगप्रद ग्रह पुरुषों के विवाह के कारक है। चंद्रमा सौन्दर्य, यौवन और कल्पना के माध्यम से स्त्री-पुरुष के मध्य आकर्षण उत्पन्न करता  है।

दो भोगप्रद तत्वों के मिलने से अतिरेक होता है। अत: सप्तम और द्वादश भावगत चंद्रमा अथवा शुक्र के स्त्री-पुरुषों के नेत्रों में विपरीत लिंग के प्रति कुछ ऐसा आकर्षण होता है, जो उनके अनैतिक यौन संबन्धों का कारक बनता है। यदि शुक्र -मिथुन या कन्या राशि में हो या इसके संग कोई अन्य भोगप्रद ग्रह जैसे चंद्रमा, मंगल, बुध और राहु हो, तो शुक्र प्रदान भोगवादी प्रवृति में वृद्धि अनैतिक यौन संबन्धों की उत्पत्ति करती है।
ऐसे व्यक्ति न्यायप्रिय, सिद्धांतप्रिय और दृढ़प्रतिज्ञ नहीं होते बल्कि चंचल, चरित्रहीन, अस्थिर बुद्धि, अविश्वासी, व्यवहारकुशल मगर शराब, शबाब, कबाब, और सौंदर्य प्रधान वस्तुओं पर अपव्यय करने वाले होते हैं। क्या ऐसे व्यक्तियों का गृहस्थ जीवन सुखी रह सकता है? कदापि नहीं। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि कुंडली में अशुभ ग्रहों की भांति शुभ ग्रहों की विशेष स्थिति से वैवाहिक सुख नष्ट होते हैं।

इन कुंडलियों को देखते हैं

कुंडली 1

एक उच्च शिक्षा प्राप्त और अच्छे पद पर कार्यरत युवती का विवाह 21अक्टूबर 1996 को हुआ और फिर परस्पर वैचारिक मतभेद एवं अहं भाव के कारण दो वर्ष बाद नवंबर 1998 में तलाक हो गया, क्यों? सप्तम भावगत बृहस्पति, द्वादश भावगत सप्तमेश और सप्तम भाव पर मंगल की दृष्टि इसके दोषी हैं। राजवधू डायना की कुंडली के सप्तम भावगत शुक्र से यौन शक्ति का अतिरेक उत्पन्न हुआ, जिसके कारण उनके अनेक व्यक्तियों से यौन संबन्ध स्थापित हुए और अन्तत: अपनी मानसिक एवं दैहिक सुखों की अन्यत्र तृप्ति हेतु उन्होंने राजमहल के सुखों का त्याग कर दिया।

कुंडली 2

इसके द्वादश भावगत मिथुन राशिस्थ शुक्र के संग बुध और केतु से जातक का भोगवादी स्वभाव चरम सीमा पर है। सप्तम भाव पर तीन मित्र,सूर्य, मंगल और बृहस्पतिद्ध मगर दूषित ग्रहों की दृष्टि से सप्तम भाव पीड़ित है। उच्च राशिस्थ बृहस्पति की मूलत्रिकोण धनु राशि षष्ठ भाव में है, इसलिए षष्ठेश के रूप में बृहस्पति से लग्न भाव भी दूषित है और इसकी पंचम, सप्तम एवं नवम सभी दृष्टियां निष्फल है, जिसके कारण यह व्यक्ति विद्या, पुत्र, रोजगार और भाग्य समृद्धि से वंचित है। इसके अनेक युवतियों से अनैतिक यौन संबन्ध स्थापित हुए। इसने अपने घर-परिवार के स्थापन और व्यवसायिक कार्यों पर कभी ध्यान केन्द्रित नहीं किया, बल्कि अपना सारा धन शराब, शबाब और लाटरी-सट्टा के माध्यम से नष्ट कर दिया। इसका विवाह 40 वर्ष की उम्र में हुआ।

कुंडली 3

तमिलनाडू की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की कुंडली में सप्तम भावगत स्वगृही और पाप ग्रहों से मुक्त बृहस्पति से बलवान हंस योग, दशम भावगत उच्च राशिस्थ शुक्र से बलवान बलवान मालव्य योग और नवम भावगत सूर्य-बुध से बुध-आदित्य योग के रुप में अनेक राजयोग विद्यमान हैं, जो सामाजिक और राजनैतिक जीवन में धन, पद एवं प्रतिष्ठा देय हैं, मगर वैवाहिक सुख नहीं। इतनी सुदृढ़ कुंडली होने पर भी जयललिता जी अविवाहित हैं। इसके दोषी केवल सप्तम भावगत देव गुरु बृहस्पति है। 40 वर्षीय अभिनेत्री मनीषा कोईराला जल्द ही शादी करने जा रही हैं। उनकी कुंडली में भी सप्तम भावगत बृहस्पति है और जो बहुत देर से शादी का योग बनाता है। गायिका अनुराधा पौड़वाल की कुंडली में सप्तम भावगत बृहस्पति और उस पर मंगल एवं शनि की दृष्टि है, वह दो विवाहों के उपरांत भी वैवाहिक सुखों से वंचित है।

कुंडली 4

राजवधू डायना की कुंडली के सप्तम भावगत शुक्र से यौन शक्ति का अतिरेक उत्पन्न हुआ, जिसके कारण उनके अनेक व्यक्तियों से यौन संबन्ध स्थापित हुए और अन्तत: अपनी मानसिक एवं दैहिक सुखों की अन्यत्र तृप्ति के लिए उन्होंने राजमहल के सुखों का त्याग कर दिया। स्वग्रही शुक्र के कारण ही उनका विवाह प्रिंस चाल्र्स से हुआ। यही नहीं चतुर्थ भाव में चंद्र केतु की युति ने जहां डायना को मानसिक रूप से परेशान रखा वहीं उनके पारिवारिक जीवन को भी नष्ट किया। कुटुंब भाव का स्वामी बृहस्पति नीच का होकर तृतीय भाव में शनि के साथ बैठा है जिसने डायना के पति के साथ विवाहके बाद वैचारिक मतभेद बनाए रखने में मदद की। शनि की तृतीय दृष्टि पंचम यानी बृहस्पति के घर पर है जिसके कारण उसकी प्रेम संबंधी अपेक्षाएं कभी पूरी नहीं हो सकीं और वह सच्चे प्रेम को पाने के लिए भटकती रही।

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