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शर्मीले बच्चे किसी से कम हैं क्या?

शर्मीले बच्चे किसी से कम हैं क्या?

दोनों मिसालों से जाहिर होता है कि शर्मिले बच्चे भी कामयाब इंसान बनते हैं। अत: उनके बारे में फिक्रमंद होने की कतई जरूरत नहीं है। तेरह साल की किशोरी तान्या खोसला को डांस, म्यूजिक और खेल-कूद से परहेज है। वह हरदम अपने सहपाठियों से कटी-कटी रहती है-न दोस्त, न सहेली। बस अकेले में। बेटी की आदत से खफा अभिभावकों ने उसे म्युजिक की हॉबी क्लास में भर्ती करवा दिया, ताकि वह अन्य बच्चों से घुलमिल सके। लेकिन हुआ क्या? तान्या ने म्युजिक क्लासों में जरा रुचि नहीं दिखाई और कुछ नहीं सीखा। सो, उसने हॉबी क्लासों से बाहर निकलने का मन बनाया और बाहर हो गई।

तान्या केवल किताबों में घुसी रहती। कभी कोर्स की, तो कभी कहानियों की। एक रोज करिश्मा हुआ। उसकी मम्मी रेखा खोसला बताती है, ‘मैंने उसके बैग से स्कूल मैगजीन निकाली और पन्ने पलटाए, तो दंग रह गई। एक पेज के कोने में में मेरी बेटी का नाम छपा था। असल में उसकी लिखी एक कहानी छपी थी। मैंने झटपट कहानी पढ़ डाली। मेरी आंखों में आंसू छलक उठे। मैंने कहानी दो-तीन बार पढ़ी। मुझे मानने में खासी देर लगी कि कहानी तान्या ने लिखी है। मैंने तान्या से पूछा कि तुमने लेखन में रुचि के बारे में बताया नहीं, तो उसने दो टूक लफ्जो में कहा ‘आप ने कभी पूछा ही कहां?’ मैंने तब जाना कि किसी के व्यक्तित्व को बदलना मुमकिन नहीं है।’ बाद में तान्या ने कविता, कहानी और निबन्ध लेखन प्रतियोगिताओं में ईनाम जीते। और आज उसका फ्रेंड सर्कल भी है।

मनोवैज्ञानिक मान्यता है कि सभी बच्चे शर्मीले होते हैं। उनकी शर्म उड़ जाती है, जब अपने जैसी आदतों के बच्चों से मिलते हैं। बच्चों पर पेरेंट्स की पसंद नापसंद थोपना बेकार है। जब हम खुद हमेशा बच्चों के मुताबिक नहीं चल सकते तो बच्चों से ऐसी उम्मीद कैसे कर सकते हैं? बदलने की कोशिश से रिश्ते में खटास के सिवाय कुछ नहीं हासिल होता।

तय है कि अभिभावकों के जरा-जरा ख्याल रखने से बच्चे अपनी शर्मीली आदत से छुटकारा पा सकते हैं। ज्यादातर बाल मनोबैज्ञानिकों की सलाह है, ‘आज के अभिभावक अत्यन्त महत्वाकांक्षी हैं। भरसक कोशिश करते हैं कि अपने में मस्त बच्चे को बदल सकें। लेकिन नहीं समझते कि ऐसा करके वे बच्चों की क्रिएटिविटी को भंग करते हैं।’

रजत मदान 14 साल का है। वह डांस सीखना चाहता था, लेकिन उसके पिता ने उसे वैदिक मैथ्य-ए-मैजिक यानी मेंटल मैथ्स की क्लास में दाखिल करवा दिया। लेकिन वह सभी लेवलों पर खास नहीं उतरा। उसे पिता की डॉंट-डपट खानी पड़ी। तब से रजत को पैनिक अटैक यानी डर के दौरे पड़ने लगे। अपने पिता से मिलते ही, उसका सांस फूलने लगता। उसके टेस्ट करवाए गए, तो उजागर हुआ कि सांस की तकलीफ महज साइकोलॉजिकल है।

रजत ने अपने पिता से कहने की हर कोशिश की। चंद सेशन लेने के बाद, रजत सामान्य होने लगा। उसके पिता ने उससे स्नेहपूर्वक बोलना शुरू किया और डांस क्लास ज्वाइन करवाई। आज रजत ठीक ठाक है और उसके यार-दोस्त भी बन गए हैं।

आमतौर पर, आज अभिभाक मानते हैं कि उनके बच्चे जितने ज्यादा घूमने-फिरने और मिलने-मिलाने वाले होंगे, उतने ज्यादा कामयाब होंगे। जबकि शर्मिले बच्चे जिन्दगी की रेस में पीछे रह जाते हैं। असल में, शर्म महसूस करने वाले बच्चे भी बुलन्दियां छूते हैं। बस फर्क इतना होता है कि बाहर निकलने में अपना वक्त लगाते हैं। मनोवैज्ञानिक राय में, ऐसा कोई बटन नहीं है, जिसे दबाने से बच्चे आप का कहना मानने लगें। इन तरीकों या उपायों से बच्चों की आजादी भंग होने के आलावा और कुछ हासिल नहीं होगा। गौरतलब है कि ज्यादातर बच्चों की शर्म की आदत अपने माता-पिता से ही विरासत में मिलती है।

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