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क्रिकेट है या गैरबराबरी की नुमाइश

इन आंकड़ों पर गौर कीजिए। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या (2001 की जनगणना के मुताबिक) लगभग 16 करोड़ है। लेकिन इंडियन प्रीमियर लीग में उत्तर प्रदेश की कोई टीम नहीं है। महाराष्ट्र की जनसंख्या सिर्फ 9.7 करोड़ है लेकिन इसके दो शहरों मुंबई और पुणे की आईपीएल टीमें हैं।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों में हैं। दूसरी ओर केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध प्रदेश मिलाकर देश की जनसंख्या के चौथाई भी नहीं होते, लेकिन इन तीनों विशाल राज्यों से एक भी आईपीएल टीम नहीं है। जबकि अगले साल 2011 से दक्षिण भारत के हर राज्य की एक आईपीएल टीम होगी।

सामान्य समझ और खबरें बताती हैं कि कश्मीर और पूर्वोत्तर को छोड़कर क्रिकेट भारत के हर राज्य में उतना ही लोकप्रिय है। आईपीएल टीमों का यह बंटवारा लोकतंत्र और जनसंख्या दोनों के तर्कों के प्रति असंवेदनशील है बल्कि यह बंटवारा क्रिकेट के तर्क से भी सही नहीं है।

मुंबई का भारतीय क्रिकेट में दबदबा है। उसने भारत की प्रमुख घरेलू टूर्नामेंट रणजी ट्राफी किसी और टीम से ज्यादा जीती हैं। लेकिन पिछले वर्षो में उत्तर प्रदेश का रणजी ट्राफी में रिकार्ड महाराष्ट्र से बेहतर रहा है। मुहम्मद कैफ के प्रेरणादायी नेतृत्व में उत्तरप्रदेश ने 2005-06 में रणजी ट्राफी जीती। इसके बाद दो बार वह फाइनल में पहुंच चुका है। दूसरी ओर महाराष्ट्र आखिरी बार फाइनल में 1992-1993 में पहुंचा था। ऐसे में कानपुर या लखनऊ या आगरा या बनारस की जगह पुणे की आईपीएल टीम होना कैसे सही हो सकता है।

टीम कोच्चि का मामला तो और भी कमजोर है। क्रिकेट के तर्क से नई टीम या तो उत्तर प्रदेश के किसी शहर की होनी चाहिए थी या मध्य प्रदेश की। मुंबई के पहले होलकर की टीम का रणजी ट्राफी में दबदबा था। महान खिलाड़ी सीके नायडू के नेतृत्व में होलकर ने 1940 और 50 के दशकों में चार बार रणजी ट्राफी जीती और छह मौकों पर वे उपविजेता रहे। पिछले दशकों में मध्य प्रदेश अक्सर रणजी ट्राफी के नाकआउट राउंड में पहुंचता रहा है। 1998-99 में तो यह टीम फाइनल में पहुंची है। दूसरी ओर केरल हमेशा से ही टूर्नामेंट की कमजोर टीमों में रही है। मेरा ख्याल है कि पिछले 40-50 वर्षो में वह शायद ही लीग राउंड के पार जा सकी है।

आईपीएल टीमों का यह असमान बंटवारा इस टूर्नामेंट के ‘इंडियन’ होने के दावे को झुठलाता है और खेल के इतिहास और उपलब्धियों के भी खिलाफ है। नागरिकता और क्रिकेट दोनों ही बाजार के तर्क के मुकाबले कमजोर पड़े हैं।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार देश के सबसे गरीब राज्यों में है। तमिलनाडु और महाराष्ट्र सबसे समृद्ध राज्यों में से हैं। कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश कहीं बीच में हैं लेकिन उन्हें एक फायदा हुआ है- इन सबमें पिछले वर्षों में बड़े पैमाने पर औद्योगिक और शहरी विकास हुआ है और सबके पास कायदे के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे हैं जहां से क्रिकेटर या योद्धा आ-जा सकते हैं।

इंडियन प्रीमियर लीग का सही नाम सुविधा प्राप्त भारतीयों की लीग होना चाहिए था क्योंकि यह टूर्नामेंट सुविधा सम्पन्न इंडिया और गरीब व अधिकारविहीन भारत के बीच गहरी खाई को दिखाता है और चौड़ा भी करता है। कुछ वर्ष पहले भारत में भयावह गैरबराबरी के बारे में अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने लिखा था कि अगर मौजूदा रवैया जारी रहा तो आधा भारत अमेरिका के कैलीफोर्निया राज्य की तरह दिखेगा और बाकी आधा भारत सहारा के नीचे वाले अफ्रीका की तरह दिखेगा। यहां दो भारत हैं एक जिसे आईपीएल की टीमें मिलती हैं दूसरा जिसे नहीं मिलतीं।

आईपीएल के कर्ताधर्ता भारतीय क्रिकेट के प्रवक्ता होने का दावा करते हैं। लेकिन असमान बंटवारे की यह प्रवृत्ति भारतीय क्रिकेट के उस समावेशी और लोकतांत्रिक स्वरूप के खिलाफ है जो 1983 के विश्व कप में जीत से शुरू हुआ था और जो सेटेलाइट टीवी के दौर में फला-फूला।

सन् 50 से 70 के दशक तक भारतीय क्रिकेट में कुछ बड़े शहरों का वर्चस्व था, जैसे मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता और बंगलुरू। 1980 के बाद छोटे और लगभग अनजाने केन्द्रों से भारतीय टीम में खिलाड़ी आने लगे। बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश यहां तक कि झारखंड के खिलाड़ी भारतीय टीम में खेलने लगे। इसी के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मैच जो सिर्फ बड़े शहरों में खेले जाते थे अब गुवाहाटी, कटक  ग्वालियर और जमशेदपुर जैसे शहरों में खेले जाने लगे।

चाहे जानबूझकर हो या अनजाने आईपीएल ने भारतीय क्रिकेट में एक नई वर्ग व्यवस्था लागू कर दी है। भारत के समृद्ध इलाकों के प्रति यह रुझान और स्पष्ट हो जाता है जब हम देखते हैं कि अलग-अलग वजहों से हैदराबाद और जयपुर में अपनी ही टीमों के मैच नहीं हो पाये। डेक्कन चार्जर्र मुंबई आ गई (जिसमें अब दो टीमें हैं) जबकि राजस्थान रॉयल्स को भारत के सबसे समृद्ध राज्य गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में जगह दी गई। लेकिन कटक या इंदौर या कानपुर को ये मैच क्यों नहीं दिये गये?

आईपीएल का दावा है कि वह क्रिकेटप्रेमियों में स्थायी वफादारी पैदा करेगा। लेकिन यह साफ है कि यह वफादारी सिर्फ दस समृद्ध शहरों के समृद्ध लोगों तक सीमित होगी। पहले कम सुविधासम्पन्न भारतीय भी हमारे महान खिलाड़ियों से जुड़ सकते थे। एक बार जब सीके नायडू ने एक एमसीसी टीम के खिलाफ शतक लगाया तो परेल के कपड़ा मजदूरों ने पैसा इकट्ठा करके उन्हें एक स्वर्ण पदक दिया।

जब महेंद्रसिंह धोनी उसके राज्य या उसके देश के लिए खेलते हैं तो झारखंड का एक आदिवासी भी उन्हें हमारा धोनी कह सकता है। लेकिन जब धोनी या तेंदुलकर अपनी अपनी आईपीएल टीमों के लिए खेलते हैं तो वे उन अरबपतियों के खिलौने होते हैं जिन्होंने उन्हें खरीदा है और जो इस मिल्कियत को सिर्फ उन सुविधा सम्पन्न भारतीयों के साथ कुछ हद तक बांटते हैं जो 40 हजार रुपये या ऐसे ही दामों पर आईपीएल का टिकट खरीदते हैं।

भारत के विकास पर कई टिप्पणीकारों ने आय और हैसियत में भारी गैरबराबरी के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक खतरों के बारे में लिखा है। जबकि एक आधुनिक और सही अर्थो में राष्ट्रभक्त मध्यमवर्ग चाहेगा कि आर्थिक विकास में सबकी हिस्सेदारी हो, लेकिन भारतीय अभिजात वर्ग का ज्यादा बड़ा हिस्सा सिर्फ अपनी आत्मकेंद्रित दुनिया तक ही सीमित है और उसे सुविधाविहीन भारतीयों की जिंदगी और मुश्किलों के बारे में या तो पता नहीं है या उपेक्षा का भाव है। यह सही है कि आईपीएल ने यह गैरबराबरी पैदा नहीं की है लेकिन उसने इसे मजबूत जरूर किया है।

लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं

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