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बाबरी मस्जिद पर आखिरी फैसला

अंजू गुप्ता ने श्रीराम की शपथ लेकर कोर्ट में जो बयान दिए, उससे तमाम शक दूर हो जाने चाहिए। अंजू आईपीएस ऑफीसर हैं। 6 दिसंबर, 1992 में जब बाबरी मसजिद ढहाई गई थी, तब वह अयोध्या में ही थीं। लालकृष्ण आडवाणी की निजी सुरक्षा का जिम्मा उनके हवाले था। अभी उनसे और सवाल-जवाब होने हैं, लेकिन हम भरोसा कर सकते हैं कि उन्होंने जो कहा वह सच ही होगा।
 
दरअसल, अंजू के बयान के बाद कोई शक नहीं रह जाना चाहिए कि उस शर्मनाक काम के लिए आडवाणी ही दोषी थे। सोमनाथ से अयोध्या की उनकी रथ यात्रा ने देश में हिंदू सांप्रदायिकता को हवा दी थी। उन्होंने मस्जिद के सामने बने मंच से भड़काऊ भाषण दिया था। बार-बार उसी ओर इशारा करते हुए वह कह रहे थे कि राम मंदिर यहीं बनना चाहिए। उन्होंने मस्जिद को ढहते हुए देखा था। जब आखिरी गुंबद ढह गया था, तो वह लोगों को बधाई देते हुए गले मिल रहे थे। जश्न मनाते हुए पेड़ा उनके मुंह में ठूंस दिया गया था।
 
अपनी आत्मकथा में उन्होंने जिक्र किया है कि वह जब दिल्ली लौट रहे थे तो उन्हें भीड़ बधाई दे रही थी। वे चीख-चिल्ला रहे थे, ‘सब सफाया कर दिया।’ इस सबके बाद आडवाणी किस मुंह से कह रहे हैं कि वह उनकी जिंदगी का सबसे दुखद दिन था। लेकिन आडवाणी के लिए आप कुछ नहीं कह सकते। वह कहते कुछ हैं, करते कुछ और हैं। उनके बारे में मणिशंकर अय्यर बिल्कुल सही कहते हैं, ‘वह ऐसे घड़ियाल हैं, जो आंसू बहाते हैं।’ इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा। आखिर उन्होंने इस देश के सेकुलर चरित्र को तार-तार कर दिया। बड़ी मेहनत से बापू गांधी, नेहरू और मौलाना आजाद वगैरह ने जिस ताने-बाने को बुना था, उसे उन्होंने बर्बाद कर रख दिया।
 
मुझे कभी-कभी अफसोस होता है कि अपने पढ़े-लिखे और ठीक-ठाक लोग भी किस तरह सोचते हैं? वे कितने आराम से कह देते हैं कि मुसलमानों ने इतने सारे मंदिरों को तोड़ा था। तब एक मस्जिद पर इतना रोना-धोना क्यों है? मेरा जवाब है कि जब भी किसी धर्मस्थल को तोड़ा जाएगा तो वह एकतरफा नहीं होगा।
 
हम जब 1947 में आजाद हुए, तो तय किया था कि पिछली बातें भुला देनी हैं। एक नया हिंदुस्तान बनाना है। उसमें सभी मजहब के लोग प्यार से रह सकें। अपने पहले तीन प्रधानमंत्रियों के वक्त तो इसे हमने बनाए रखा। ये सिलसिला चलता रहता, लेकिन बाबरी मस्जिद ढहाने की साजिश हो गई।

इस साजिश को रचने वाले जानते थे कि उसके बाद क्या होने वाला है? उस शर्मनाक हरकत के अगले ही दिन पाकिस्तान, बांग्लादेश से लेकर इंग्लैंड तक कई मंदिर और गुरुद्वारे ढहा दिए गए। आमतौर पर हिंदू और सिख को साथ रखकर ही देखते हैं मुसलमान। उसके बाद सांप्रदायिकता का जहर अपने देश की फिजाओं में बस गया। क्या यह सही वक्त नहीं है कि हम उन जहर घोलने वालों को सजा दिलाएं और सांप्रदायिक सद्भाव की बुनियाद रखें।

रामायण
मेरी धेवती नैना दयाल ने हाल ही में रामायण पर जेएनयू से पीएचडी की है। उसने बताया कि रामायण के कई संस्करण हैं और यह भी तय नहीं है कि उन्हें कब लिखा गया है? एक रामायण वाल्मीकि की है। वह कौन थे हम नहीं जानते? वह तीसरी सदी ईसा पूर्व या चौथी सदी में हो सकते हैं। लेकिन वही महाकाव्य है, जो हिंदुओं के मन में बसा हुआ है। उसे लेकर यहां का समाज कोई सवाल उठाना नहीं चाहता।
 
इधर राम वर्मा ने अपनी रामायण लिखने की कोशिश की है। इलाहाबाद में पढ़ाई-लिखाई के बाद वह जोधपुर में अंग्रेजी के प्रोफेसर हो गए। बाद में आईएएस में चले आए और हरियाणा के मुख्य सचिव तक पहुंचे। सन् 2000 में रिटायर होने के बाद वह रामायण पर जुट गए। दस साल में उन्होंने अपनी राम कथा लिखी। रूपा से आई यह रामकथा है, ‘बिफोर ही वाज गॉड : रामायण रिकंसिडर्ड रिक्रिएटिड।’ उनकी बेटी वंदना सहगल ने उसमें रंगीन चित्र बनाए हैं।

इसी रामनवमी पर उसे लॉन्च किया गया। पहले ही दिन वह अच्छी-खासी बिक गई। इस कथा को उन्होंने बारह अध्यायों में बारहमासी के अंदाज में बांटा है। साल के बारह महीनों को अध्याय बना कर राम कथा का ताना-बाना बुना गया है। पहला अध्याय राम परिवार पर है। आखिरी में सीता की अग्निपरीक्षा के बाद राम का अयोध्या लौटना है। मुझे उसे पढ़कर मजा आया। पता नहीं उनकी राम कथा पर अपने फंडू क्या सोचेंगे?

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