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थोड़ा सा बेसब्र हो जाओ

फिक्र करना क्या अच्छा हो सकता है? अति तो खैर किसी भी चीज की बुरी होती है। लेकिन थोड़ी-बहुत फिक्र आपको लगी रहती है, तो वह अच्छा ही है। फिक्र करना उतना बुरा नहीं है, जितना माना जाता है।

हाल ही में इंग्लैंड के एक न्यूरो डॉक्टरों की टीम ने रिसर्च की है। डॉ. रॉबर्ट स्टीवर्ट उस टीम के लीडर थे। उनका मानना है कि थोड़ी-बहुत फिक्र अच्छी है। उसी से आप बेसब्री की ओर बढ़ते हैं। और जब आप परेशान होते हैं, तो यही बेसब्री आपको मदद मांगने की ओर ले जाती है। आप उस हालात से निकलना चाहते हैं, सो निकलने का रास्ता तलाश ही लेते हैं।

इन लोगों ने डिप्रेशन से परेशान लोगों पर रिसर्च की। उन्होंने पाया कि उनमें से जो लोग बेसब्र थे, वे ज्यादा वक्त तक जी पाए। उनमें जीने की ललक ज्यादा थी। यह जो फिक्र करना है। बेसब्र हो जाना है। उसका मतलब है कि हम जीना चाहते हैं। एक तरह की जिंदगी जीने की इच्छा है। वह जिंदगी हमें नहीं मिलती, तो बेसब्री होती है।

अब अपनी चाहत की नहीं बल्कि जो हमें जिंदगी मिलती है, उसे हम बदलना चाहते हैं। और उसे बदलने की बेसब्री से जिंदगी बदलने लगती है। हम जिंदगी को बदलना चाहते हैं। उसे बदलने के सिलसिले में खुद भी बदल जाते हैं। या बदलना चाहते हैं।

दरअसल, बेसब्री हमें लगातार कुछ न कुछ करने को मजबूर करती है। वह हमें बैठने नहीं देती। उससे कम से कम हम एक प्लान बनाने में जुटते हैं। अपने को फोकस करने की कोशिश तो करते हैं। अपने यहां कहते हैं न कि प्रभु के लिए अगर बेसब्री नहीं है, तो वह मिलेंगे कैसे? सूफी उसके लिए तड़प की बात करते हैं। जिंदगी में कुछ करने के लिए कहीं तो बेसब्री चाहिए न। फिक्र और बेसब्री पर फिर से सोचिए न।

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