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इस्तीफा नहीं रणनीति

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी बड़ी चूक या विफलता का जिम्मा राजनीतिक नेतृत्व का होता है। उस जवाबदेही को स्वीकार करने से नेतृत्व का कद छोटा नहीं, बड़ा बनता है। इस लिहाज से दंतेवाड़ा की घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने इस्तीफे की पेशकश कर नेतृत्व का बड़प्पन दिखाया है। लेकिन इस्तीफा तब तक किसी समस्या का समाधान नहीं होता जब तक कि इस्तीफा देने वाला अक्षम और अकर्मण्य न हो।

गृहमंत्री की कार्यक्षमता ऐसे किसी संदेह के परे रही है। मुंबई में 26 नवंबर 2008 की आतंकी घटना के बाद उन्होंने सुरक्षा बलों को चुस्त करने के जो सिलसिलेवार उपाय किए हैं, उसके अच्छे परिणाम भी दिखे हैं। इसीलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चिदंबरम के इस्तीफे की पेशकश ठुकरा भी दी है। लेकिन यह विडंबना ही कही जाएगी कि चंद दिन पहले गृहमंत्री ने माओवादी हिंसा का जो ठीकरा पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के सिर फोड़ने की कोशिश की थी वह उन्हीं के सिर फूटने लगा।

गृहमंत्री की दिक्कत यह है कि आंध्र प्रदेश को छोड़कर देश के जितने राज्यों में माओवादी गतिविधियां चल रही हैं वहां किसी में कांग्रेस की सरकार नहीं है। भले ही मौजूदा माओवाद का शीर्ष नेतृत्व आंध्र प्रदेश का है, पर उसकी सक्रियता आंध्र प्रदेश के बाहर है। ऐसे में केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच माओवादी हिंसा के खिलाफ कार्रवाई के तालमेल में दिक्कत आ ही जाती है।
  
हालांकि अभी इस बात की जांच हो रही है कि दंतेवाड़ा की घटना में सीआरपीएफ के जवानों के मारे जाने में चूक किस स्तर पर हुई, पर थलसेनाध्यक्ष और दूसरे विशेषज्ञों ने यह बात साफ तौर पर कही है कि उनके प्रशिक्षण में कमी थी। यहां गृहमंत्री का यह बयान भी काफी मायने रखता है कि कानून-व्यवस्था से निपटने का काम मूल रूप से राज्य सरकार का होता है और केंद्रीय अर्धसैनिक बल उसी के निर्देशन में काम करते हैं यानी दंतेवाड़ा में स्थानीय पुलिस और अर्धसैनिक बल के बीच बेहतर तालमेल न होने की बात सिरे से खारिज नहीं की जा सकती।

दिक्कत तब शुरू होती है जब माओवाद से राजनीतिक लाभ लेने की खींचतान होती है। सारे राजनीतिक दल माओवाद के सहारे चुनावी पलड़े को अपने पक्ष में झुकाने की कोशिश करते हैं और यहीं पर उससे निपटने की कार्रवाई का फोकस बदल जाता है। माओवाद के स्वरूप और उससे निपटने के तरीके पर यह राजनीतिक मतभेद केंद्र और राज्य सरकारों के बीच ही नहीं, केंद्र सरकार और पार्टी संगठन के बीच भी हो सकता है। इसीलिए गृहमंत्री ने ज्यादा कुछ न स्पष्ट न करते हुए इतना जरूर कहा है कि उनसे परोक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेदारी महसूस करने के लिए कहा गया था। उसी के बाद उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की।

दरअसल माओवाद की वास्तविक स्थिति और उस पर चलने वाली कार्रवाई ऑपरेशन ग्रीन हंट के बारे में सरकारी स्तर पर दावे के साथ कुछ न कहा जाना भी असमंजस को दर्शाता है। प्रधानमंत्री एकतरफ माओवाद को सबसे बड़ा खतरा बताते हैं तो दूसरी तरफ गृहमंत्री ग्रीन हंट को मीडिया का हौवा बताते हैं। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का मौन भी कयासों को जन्म देता है, लेकिन दंतेवाड़ा की घटना के बाद राजनीतिक नेतृत्व को इस दुविधा से निकलना ही होगा।

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