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चीन-भारत और एशियाई सदी

चीन और भारत के बीच राजनयिक रिश्तों का यह साठवां साल है। दोनों देशों में रिश्ते इधर सुधर रहे हैं। साल के पहले दो महीनों को देखें तो पिछले साल की तुलना में दोनों देशों के कारोबार में 55 फीसदी इजाफा हुआ है। दोनों के रिश्ते तो सुधर रहे हैं, लेकिन कुछ मुद्दों पर वे सहज नहीं हो पाए हैं। एक मसला तो सीमा का ही है। दोनों देश करीब दो हजार किलोमीटर की सीमा रेखा से जुड़े हैं। उन सीमाओं को लेकर दोनों खुश नहीं हैं। दूसरा, चीन का कद अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ता देख कई भारतीय उन्हें अपना प्रतिद्वंद्वी मान कर चलते हैं। भारतीयों को एक दिक्कत और है। वह है पाकिस्तान से चीन के रिश्ते, लेकिन अगर चीन दोनों देशों के साथ बेहतर रिश्ते बनाता है, तो क्या बुरा है? उससे तो एशिया में शांति और स्थिरता कायम होने में मदद मिलेगी। एक बात तय है कि इस सदी को एशियाई सदी में बदलने का सपना तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक ये दोनों महान देश एक साथ नहीं आते।
चायना डेली

धमकाने वालों को बचाना है
मतदाताओं को धमकाने के सिलसिले में न्यू ब्लैक पैंथर पार्टी पर मामला चल रहा है। यह घटना 2008 में फिलाडेल्फिया में हुई थी। अब डेमोक्रेट इन लोगों को बचाने में लगे हैं। सदन और सीनेट की न्यायिक समिति को इंसाफ करना है ताकि सदन की गरिमा बनी रहे। लेकिन वे कर कुछ और ही रहे हैं। 11 महीने पहले उन्होंने चार में से तीन लोगों को छोड़ दिया। बाकी एक जो बचा, उसके खिलाफ मामला ही कमजोर बना दिया। यही मामला है, जहां हमारा न्यायिक विभाग मनमानी कर रहा है। वह ऐसे बर्ताव कर रहा है, जैसे उसकी किसी के लिए कोई जवाबदेही ही न हो।
वॉशिंगटन टाइम्स

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