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पाप यानी प्रेम का अभाव

तुम चोरी कर सकते हो क्योंकि तुम जिस व्यक्ति की चोरी कर रहे हो उसके प्रति तुम्हारे मन में कोई प्रेम नहीं है। तुम हत्या कर सकते हो क्योंकि जिसकी हत्या कर रहे हो उसके प्रति तुम्हारे मन में कोई प्रेम नहीं। तुम धोखा दे सकते हो, बेईमानी कर सकते हो, आतंक और हिंसा कर सकते हो, सिर्फ इसलिए कि प्रेम का अभाव है।

प्रेम को ठीक से समझ लें। पहली तो बात है कि प्रेम और पाप विपरीत होने चाहिए। तभी प्रेम से पाप मिट सकेगा। तुमने कभी इस तरह शायद सोचा न हो कि प्रेम और पाप दुनिया में गहरी से गहरी विरोधी स्थितियां हैं। क्योंकि जब भी तुम पाप करते हो, तभी प्रेम नहीं होता है इसीलिए कर पाते हो। सभी पाप प्रेम के अभाव से पैदा होते हैं। अगर प्रेम हो तो पाप असंभव है।

महावीर की अहिंसा, बुद्ध की करुणा, इन सभी का अर्थ है प्रेम। और जीसस तो साफ कहते हैं- लव सज गॉड। ईश्वर की बात ही छोड़ दो प्रेम ही परमात्मा है। प्रेम तो एक अग्नि है। जैसे सोना निखर जाता है अग्नि से गुजर कर, वही बचता है जो बचने योग्य है, बचाने योग्य है, वह जल जाता है जो कचरा था, ऐसे ही प्रेम की अग्नि से गुजरकर तुममें जो व्यर्थ है वह जल जाता है। जो सार्थक है वह बच जाता है। जो पाप है खो जाता है, जो पुण्य है बच जाता है।

समस्त पाप प्रेम की गैर-मौजूदगी में पैदा होते हैं। जैसे प्रकाश न हो तो अंधेरे घर में सांप, बिच्छू, चोर, बेईमान, लुटेरे सभी का आगमन हो जाता है। मकड़ियां जाले बुन लेती हैं। सांप अपने घर बना लेते हैं। चमगादड़ निवास कर लेते हैं। रोशनी आ जाए, सब धीरे-धीरे विदा होने लगते हैं। तो प्रेम रोशनी है। और तुम्हारे जीवन में प्रेम का कोई भी दीया नहीं जलता इसलिए पाप हैं। पाप के पास कोई विधायक ऊर्जा नहीं है। कोई पॉजिटिव एनर्जी नहीं है। पाप सिर्फ नकारात्मक है। वह सिर्फ अभाव है। तुम कर पाते हो क्योंकि जो तुम्हारे भीतर होना था, वह नहीं हो पाया।

थोड़ा समझें। तुम क्रोध करते हो, और सारे धर्म-शास्त्र कहते हैं कि क्रोध मत करो। लेकिन अगर तुम्हारी जीवन-ऊर्जा का बहाव प्रेम की तरफ न हो तो तुम करोगे भी क्या? क्रोध करना ही पड़ेगा। क्योंकि क्रोध, ठीक से समझो तो ही प्रेम है, जो मार्ग नहीं खोज पाया। वही ऊर्जा जो फूल नहीं बन पाई, कांटा बन गई है। प्रेम है सृजन। और अगर तुम्हारे जीवन में सृजनात्मकता, क्रिएटिविटी न हो पाए, तो तुम पाओगे कि तुम्हारी जीवन-ऊर्जा विध्वंसात्मक हो गई, डिस्ट्रक्टिव हो गई।

तो जो आदमी भी सृजन कर सकता है, वह शैतान नहीं हो सकता। और जो आदमी भी सृजन नहीं कर सकता, वह लाख अपने को समझाए कि संत है, वह संत नहीं हो सकता। क्योंकि ऊर्जा का क्या होगा। जीवन शक्ति है, उस शक्ति का तुम क्या करोगे। कुछ होना चाहिए। अगर तुम प्रेम करने लगो तो तुमने उसी शक्ति के लिए नई नहरें खोद दीं। अगर तुम्हारे जीवन में प्रेम न हो तो तुम्हारी जीवन शक्ति क्या करेगी? तोड़ेगी, फोड़ेगी, मिटाएगी। अगर तुम बनाने में न लग सके तो मिटाने में लगोगे।

प्रेम का लक्ष्य है- सृजन। और जब तुम सृजनात्मक होते हो जीवन-संबंधों में, तुम पाप नहीं कर सकते। प्रेम धीरे-धीरे फैलता जाएगा तो तुम पाओगे कि मैं ही हूं सभी के भीतर छिपा हुआ। किसकी चोरी करूं? किसको धोखा दूं? किसकी जेब काटूं? क्योंकि जितना तुम्हारा प्रेम बढ़ेगा उतना ही तुम पाओगे कि ये सारी जेबें अपनी ही हैं। और इधर मैं किसी को नुकसान पहुंचाता हूं, वह नुकसान अंतत: मुझे ही पहुंच जाता है। जितना तुम्हारा प्रेम बढ़ता है, उतना तुम्हें यह साफ होने लगता है कि यहां पराया कोई भी नहीं है। जिस व्यक्ति से तुम्हारा प्रेम हो जाता है, उससे परायापन मिट जाता है।

प्रेम शब्द तो हम जानते ही हैं। हम कहेंगे कि यह भी कोई कुंजी हुई। यह शब्द तो परिचित है। शब्द के परिचय से कुछ भी न होगा। तुमने भाषाकोश से शब्द सीखा है, जीवन के कोश से नहीं सीखा। भाषाकोश में प्रेम के अर्थ लिखे हैं। उन अर्थों से प्रेम का कोई संबंध नहीं।

जीवन के कोश में, जहां तुम्हारे अनुभव से प्रेम उपजता है, तब उसकी जीवंतता और है, उसकी अग्नि और है। जैसे भाषाकोश में लिखा है शब्द- अग्नि; उससे तुम जल न सकोगे। और लिखा है जल; उससे तुम्हारी प्यास तृप्त न होगी। वैसे ही भाषाकोश में लिखे प्रेम को अगर तुमने समझा, तो तुम्हारे आंतरिक पाप न धुल सकेंगे। और नानक कहते हैं, जिस दिन तुम्हारा प्रेम परमात्मा के नाम की तरफ बहेगा, रंग गए तुम! फिर धुल जाओगे। अतीत के पाप से ही नहीं धुल जाओगे, भविष्य की संभावना से भी धुल जाओगे। इससे पहले कि गंदे होओ, धुले रहोगे।

नानक कहते हैं, ‘इस पृथ्वी को उसने धर्मशाला की तरह बनाया। और वहां अपने-अपने कर्म के अनुसार उनका विचार होता है।’ और नानक कहते हैं, ‘इस धर्मशाला में अगर तुम स्मरण रख सको कि यह धर्मशाला है, तो तुम्हारे निन्यानबे प्रतिशत कृत्य बंद हो जाएंगे।’ यह थोड़ा सोच लेने जैसा है। क्या तुम पत्नी पर क्रोध करोगे? पत्नी तो छूट जाएगी क्योंकि मौत के समय तुम पत्नी को साथ न ले जा सकोगे। लेकिन तुमने जो क्रोध किया, तुमने जो नाराजगी की, तुमने जो दुख पहुंचाया, वह सब कृत्य तुम्हारे साथ चले जाएंगे। सपने तो टूट जाएंगे लेकिन सपनों में तुमने जो किया वह पीछा करेगा। सौदा बहुत महंगा है। संसार में आदमी पाता कुछ नहीं, केवल खोता है।
प्रस्तुति- अजय विद्युत

प्रेम शब्द नहीं, जीवन का अर्थ
परमात्मा के बाद प्रेम से ज्यादा महत्वपूर्ण और कोई शब्द नहीं है। नानक कहते हैं कि प्रेम के रंग में जो रंग जाता है उसके भीतर के पाप धुल जाते हैं।
भरीए हथु पैरु तनु देह।
पाणी धोते उतरसु खेह।।
मूत पलोती कपड़ होइ।
दे साबूण लईऐ ओहु धोइ।।
भरीऐ मति पापा के संगि।
ओहु धोपै नावै कै रंगि।।

यदि हाथ-पैर और शरीर के दूसरे अंगों में धूल जम जाए, तो पानी से धोने से मैल साफ हो जाता है। यदि मूत्र से कपड़े अशुद्ध हो जाएं, तो साबुन से धोकर उन्हें साफ कर लिया जाता है। वैसे ही यदि बुद्धि पापों से भरी हो, तो वह नाम के प्रेम से, प्रेम के रंग से शुद्ध की जा सकती है। प्रेम शब्द तो हम जानते ही हैं। हम कहेंगे कि यह भी कोई कुंजी हुई। तुमने भाषाकोश से शब्द सीखा है, जीवन के कोश से नहीं सीखा। भाषाकोश में प्रेम के अर्थ लिखे हैं। उनका प्रेम से कोई संबंध नहीं।

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