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विवेक सध जाए तो वैराग्य की जरूरत नहीं रहती

परिवर्तनशील का पता चलता है पर जो अपरिवर्तनशील है उसका अहसास होता है, पता नहीं चलता। सत्य का अहसास होता है, असत्य का पता चलता है। इसी को विवेक कहते हैं। विवेक क्या है। सत्य क्या है, असत्य क्या है.. कौन सा सुख है, कौन सा दुख है.. यह जान लेना ही विवेक है। विवेक सध जाए तो फिर वैराग्य की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

वैराग्य माने क्या? इहा परक भोग विराग। किसी के प्रति रुचि न रखना, न यहां का, न पर का। रुचि न रखना से आशय है कि उसके प्रति ज्वर से पीड़ित न रहना। जो फल हमको यहां मिल रहा है या मिलेगा आगे, उसके प्रति कोई ज्वर न रखना ही विराग है। तो अगर वैराग्य से पहले विवेक सिद्ध हो जाए कि क्या नित्य है, क्या अनित्य है, तो फिर उसमें न राग रहता है और न द्वेष रहता है। अक्सर लोग राग करते है या द्वेष करते हैं। राग-द्वेष से मुक्ति हो जाना ही विवेक है।

कहते हैं कि सेवा करने वाले लोग प्रभु को ज्यादा प्रिय हैं। और कुछ कहते हैं कि ईश्वर सबको बराबर प्रेम करते हैं। यह कैसे? हां, कृष्ण एक लम्बी लिस्ट देते हैं कि कौन उनके प्रिय हैं। गीता का बारहवां अध्याय उससे भरा हुआ है। वे कहते हैं कि जो किसी को द्वेष नहीं करता। जो सबके प्रति मैत्री और करुणा रखते हैं। जिनमें ममता नहीं है, अहंकार नहीं है, जो सुख-दुख में समान रहने वाले हैं वे सब मुझे प्रिय हैं। जो शत्रु और मित्र नहीं देखते और सबके प्रति समता में रहते हैं, ऐसे व्यक्ति भी मुझको बहुत प्रिय हैं।

यह तो सहज ही है। तुम भी तो कुछ चीजों को पसंद करते हो। जैसे तुम भोजन करते हो। तो कुछ तो पसंद होगा। जैसे कहोगे कि मुझे करेला पसंद है। या मुझे बैंगन का भरता पसंद है। तो इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी सब पसंद नहीं है। किसी को बैंगन भरता पसंद है तो वह हमेशा बैंगन भरता ही नहीं खा सकता। हां दाल रोटी के साथ बैंगन भरता पसंद है तो वह खाते हो। है न।

इस तरह से कृष्ण कहते हैं और कभी भ्रम भी पैदा करते हैं। और उनका काम यही है कि भ्रम पैदा करो। अर्जुन को बड़ा भ्रम हो गया। वह कहता है कि कोई एक चीज बताओ भाई, तुम यह भी बताते हो, वह भी बताते हो, इसे भी ठीक कहते हो, उसे भी ठीक कहते हो। मेरा दिमाग तिलमिला गया है।

तब फिर कृष्ण बताते हैं कि ये सब एक ही है। फिर भी अलग-अलग बोलता हूं तो भी एक ही है। संन्यासी भी, योगी भी, काम करने वाले भी, नहीं करने वाले भी, सब एक हैं। पर इसका मतलब यह नहीं कि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। ऐसा नहीं है। काम सबको करना ही पड़ेगा। खाली कोई बैठ ही नहीं सकता दुनिया में इसलिए सबको कर्म का मार्ग अपनाना पड़ेगा। यह साफ-साफ कहा है।

तपस्या किसे कहते हैं?
तपस्या उसी को कहते हैं कि जो पसंद नहीं है, फिर भी करना पड़ता है। अब बस में बैठकर जा रहे हैं दस घंटे, तो बीच में तो उतर नहीं सकते। बस में बैठे हुए हैं, यह तपस्या है। इतनी देर बैठने को किसी का दिल तो नहीं करता। पर बस में बैठे हैं तो बैठे रहना पडेगा। यानी जो पसंद नहीं है पर जिसको करने से श्रेय मिलता है, जिसमें हमारा हित है, वह तपस्या है। (प्रअवि)

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